सदर विधानसभा क्षेत्र के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के बसपा में शामिल होने से जिले की चारों सीटों पर बसपा को संजीवनी मिलने की उम्मीद है। मुख्तार के आने से जहां बसपा को वोटों का फायदा हो रहा हैं वहीं मुख्तार के खिलाफ मतों के ध्रुवीकरण का भी खतरा है। इसे देखते हुए सपा और भाजपा अपने-अपने ढंग से चुनावी रणनीति पर विचार कर रहे हैं।
मुख्तार अंसारी की जिले की सदर विधानसभा सीट से सबसे पहले विधायक 1996 में बसपा से ही बने थे। इसके बाद वह निर्दल हो गए और उन्होंने खुद की पार्टी कौमी एकता दल बनाई। लेकिन बीच में कभी उनकी नजदीकी बसपा तो कभी सपा से रही। मगर निर्दल होते हुए भी 2002 एवं 2007 का चुनाव जीते। 2012 में सदर विधानसभा सीट पर बसपा और सपा ने मुख्तार अंसारी के खिलाफ प्रत्याशी उतारा और कड़ी टक्कर दी। इसमें बसपा जहां दूसरे स्थान पर रही वहीं सपा तीसरे स्थान पर रहते हुए भी मुस्लिम मतों में काफी सेंधमारी की। 2017 को लेकर समाजवादी पार्टी ने मुख्तार की पार्टी कौमी एकता दल का विलय कराया, लेकिन ऐन वक्त पर पार्टी में इसे लेकर विवाद हो गया।
दो दिन पहले बसपा ने मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल कर न सिर्फ उन्हें सदर विधानसभा और घोसी से उनके बेटे अब्बास को भी टिकट दे दिया। इससे अन्य दलों के समीकरण गड़बड़ा गए हैं। राजनीति से जुड़े लोगों का कहना है कि मुख्तार के आने से जहां बसपा को फायदा होगा वहीं मुख्तार के खिलाफ वोटों का ध्रुवीकरण भी संभव है। ऐसी स्थिति में उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ सता है।