मऊ। दिसंबर के अंत में पारे में लगातार गिरावट कड़ाके की ठंड जारी है। इसके बावजूद भी जिले की किसी भी सीएचसी पर मरीजों के लिए ठंड से बचाव के कोई उपाय नहीं हैं। वार्डों में न तो हीटर लगे हैं न ही बाहर ही कोई अलाव की व्यवस्था है। मरीज और तीमारदार ठंड से बचाव के लिए खुद के संसाधनों का प्रयोग कर रहे हैं।
जिले की 10 सीएचसी पर कुल 300 बेड लगे हैं, लेकिन इन सीएचसी पर कहीं पर भी ठंड से बचाव की कोई व्यवस्था नहीं है। विभागीय के आंकड़ाें के मुताबिक एक सीएचसी पर रोजाना 200 से अधिक मरीजों का उपचार होता है। एक सीएचसी पर 30 बेड मरीजों को भर्ती कराने के लिए लगाए गए हैं। जनपद में ठंड का सितम इस कदर बढ़ा है कि न्यूनतम पारा 11 डिग्री तक आ पहुंच गया है। लेकिन किसी भी सीएचसी पर मरीजों को ठंड से बचाव के लिए कोई इंतजाम नहीं है। मंगलवार को अमर उजाला की टीम ने जिले की कई सीएचसी की पड़ताल की, इसमें बलिया की सीमा से सटे रतनपुरा सीएचसी में कोई मरीज भर्ती नहीं था। वार्ड में कहीं पर हीटर नहीं लगा था। किसी भी खिड़की पर्दा नहीं लगा था। आने वाले मरीज ओपीडी से परामर्श और दवा लेकर घर चले जा रहे थे। कुछ ऐसा ही हाल रानीपुर सीएचसी का भी था, वहां पर भी इमरजेंसी से लेकर वार्ड में कोई हीटर नहीं लगा था। बेड खाली थे। सीएचसी पर आने वाले मरीजों के तीमारदारों ने बताया कि रात में ठंड से बचाव के लिए कोई संसाधन नहीं होने से मरीजों को परेशानी हो रही है। दोहरीघाट सीएचसी पर वार्ड में कोई मरीज नहीं था। सीएचसी परिसर में अलाव नहीं जल रहा था। चिकित्सक के कमरे में हीटर लगा था। वार्ड में खिड़की पर पर्दा लगा था और सभी शीशे भी सही थे। कोपागंज सीएचसी पर मरीजों के लिए भर्ती वार्ड में हीटर या कोई भी दूसरा संसाधन नहीं था। सीएचसी के अनेक अनुभाग में आने वाले मरीज डॉक्टर से परामर्श लेने के बाद दवा ले रहे थे। घोसी सीएचसी के वार्ड में भी कोई मरीज भर्ती नहीं था।
जनपद की हर सीएचसी पर रोगी कल्याण समिति की मद हर साल पांच लाख रुपये का बजट दिया जाता है। संबंधित प्रभारी को इसी मद से ठंड से बचाव के साथ स्वास्थ्य केंद्र पर जो भी आवश्यक सामाग्री है, उसकी खरीदारी कर सकता है।
-डॉ. राहुल सिंह, मुख्य चिकित्साधिकारी