मऊ। महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी भाषा और साहित्य तक ही सीमित नहीं थे बल्कि वे अंग्रेजी के भी अच्छे अध्येता थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना जगाई थी। ये बातें हिंदुस्तानी एकेडमी प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह ने डीसीएसके पीजी कालेज तथा हिंदुस्तानी एकेडेमी प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में डीसीएसके पीजी कालेज के सभागार में शनिवार से शुरू तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में कहीं।
विशिष्ट अतिथि मारीशस के विश्व हिंदी सचिवालय के महासचिव प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने आनलाइन उद्बोधन में कहा कि आचार्य द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से हिंदी जगत को न केवल जगाया अपितु रचनाकारों का मार्गदर्शन भी किया। चिट्ठी लिख लिख कर उन्होंने रचनाकार पैदा किए। नार्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय से जुड़े डॉ. सुरेश चंद शुक्ल ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के संपादन से सन 1903 में जुडे़। इसके लिए उन्होंने अपनी रेलवे की 200 रुपये की नौकरी छोड़ दी थी। हिंदी के प्रति उनका समर्पण आज के हिंदी प्रेमियों के लिए प्रेरणा का काम करता है। चीन के ग्वांगझो विश्वविद्यालय से आए डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा गुणशेखर ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सामाजिक सरोकार के रचनाकार होने के नाते स़्त्री शिक्षा के पक्षधर थे और इसके लिए उन्होंने खुल लिखा। दूसरे सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय से आए मुख्य वक्ता डॉ. सत्यप्रिय पांडेय ने कहा कि उनकी सरस्वती पत्रिका का कोई ऐसा अंक नहीं मिला जिसमें किसानों पर लेखन नहीं मिलता हो। महावीर प्रसाद द्विवेदी के रचना-संसार में स्वदेशी आंदोलन की तीक्ष्ण अभिव्यक्ति मिलती है। अध्यक्षता करते हुए जयप्रकाश विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अजय कुमार ने आचार्य द्विवेदी की रचनाओं पर प्रकाश डाला। संपूर्णानंद विश्वविद्यालय की डॉ. नीलम सिंह ने आचार्य महावीर प्रसाद के द्विवेदी की रचनाधर्मिता पर अपने विचार रखे। इस दौरान सिद्धार्थ शंकर, अजय कुमार, डॉ. राकेश कुमार सिंह आदि शामिल रहे। अध्यक्षता डॉ. अरविंद कुमार मिश्र ने की।