फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ढाई साल में ही खत्म हो गया जनता पार्टी का जनाधार

विज्ञापन
विज्ञापन
मुहम्मदाबाद गोहना। आपात काल की समाप्ति के बाद साल 1977 में उत्तर प्रदेश में सातवीं विधानसभा का चुनाव कराया गया था। इस चुनाव में इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी के खिलाफ बने माहौल से उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी का उदय हुआ था। इस चुनाव में जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत साबित हासिल किया। लेकिन यह बहुमत मात्र ढाई सालों में ही बिखर गया। जनता पार्टी में शामिल दलों के आपसी मनमुटाव के चलते लगभग ढाई साल बाद ही 28 मई 1980 को एक बार फिर से प्रदेश में आठवीं विधानसभा के लिए मतदान हुआ। इस चुनाव में जनता पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। जनता पार्टी से अलग होकर तमाम राजनैतिक दलों ने अलग होकर चुनाव लड़ा। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर प्रदेश में अपना डंका बजाया और प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी किया। इस प्रचंड बहुमत में तत्कालीन आजमगढ़ और अब मऊ जनपद की वर्तमान चारों विधान सभाओं में एक बार फिर से जनता पार्टी का वर्चस्व टूट गया और 1977 में जीते सभी प्रत्याशी इस चुनाव में जीत की दहलीज तक नहीं पहुंच सके। आंकड़ों के अनुसार, मुहम्मदाबाद गोहना सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र में भाकपा के तपेश्वर राम ने एक बार फिर से पार्टी का झंडा बुलंद किया और उन्होंने 18,989 मत पाकर कांग्रेस के श्रीनाथ को 6,159 मतों से पराजित किया। मऊ विधानसभा में भी जनता पार्टी के रामजी सिंह मैदान में अपनी उपस्थिति कायम नहीं रख सके। यहां से निर्दलीय खैरुल बशर ने 19,499 मत पाकर कांग्रेस के सुहेल अहमद को 2,042 मतों से पराजित किया। घोसी विधानसभा का चुनाव भी जनता पार्टी प्रत्याशी के लिए रास नहीं आया। यहां से कांग्रेस आई के केदार सिंह ने 30,321 मत पाकर जनता पार्टी सेक्युलर के शत्रुघभन को 14,910 मतों से पराजित किया। इसी प्रकार नत्थूपुर विधानसभा में 1977 के चुनाव में मात्र कुछ मतों से पराजित कांग्रेस के राजकुमार राय 29,319 मत पाकर जीते। उन्होंने जनता पार्टी सेक्युलर के प्रत्याशी विष्णुदेव को 9,157 मतों से हराया। 1980 का चुनाव भी बदलाव के लिए जाना जाता है। 1977 में जीत हासिल करने वाले चारों विधानसभा में कोई भी प्रत्याशी अपनी जीत दोहरा नहीं सका और प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सत्ता में वापसी के साथ ही जनता पार्टी का अस्तित्व ही हाशिए पर पहुंच गया था।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें