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बकरियों में संक्रामक रोग:निदान एवं बचाव

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मऊ कृषि विज्ञान केंद्र पिलखी वरूना के वरिष्ठ बैज्ञानिक बी के सिंह ने एक विज्ञप्ति में बताया कि बकरी पालन गरीब एवं भूमिहीन किसानों के लिए आज कल वरदान साबित हो रहा है। इसमें कम खर्च,अति सरल प्रबंधन से अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है।बताया कि बकरी पालन को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए बकरियों को स्वस्थ रखना बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है। बताया है कि बकरियों में संक्रामक रोगों में पीपीआर नाम की बीमारी प्राण घातक बीमारी है। यह बीमारी वर्ष में कभी भी बकरियों को संक्रमित कर सकती है परंतु विशेष रुप से वर्षा ऋतु में इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है। उन्होंने बताया है कि इस बीमारी के प्रमुख लक्षण मुंह एवं नाक में छाले पड़ जाना, नाक, मुंह , आंख से पानी का स्राव होने के साथ ही पाचन तंत्र में भी छाले पड़ जाना हैं। जिससे पशु चारा दाना लेने में असमर्थ हो जाते हैं। इन लक्षणों के साथ-साथ बकरियों में पतले दस्त शुरू हो जाते हैं इसका पहचान पशुपालक नाक मुंह के छाले से कर सकते हैं । संक्रमित पशुओं को तत्काल समय से इलाज नहीं कराया गया तो वह 4 से 7 दिनों के अंदर अकाल मृत्यु को प्राप्त कर जाते हैं। इससे बचाव के लिए पशुपालन विभाग द्वारा पीपीआर के टीके प्रतिवर्ष बकरियों में लगाए जाते हैं। प्रथम बार टीका बकरियों (नर या मादा )में उम्र के 4 माह पर अवश्य लगवा देना चाहिए। इस टीके की प्रतिरक्षा 3 वर्ष की होती है। इस प्रकार पशुपालक भाई अपनी बहुमूल्य बकरियों को समय से टीकाकरण करा कर सुरक्षित रख सकते हैं।
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