मऊ। प्रवासी मजदूरों के जद्दोजहद के साथ घर आने का सिलसिला जारी है। लाकडाउन के दौरान कंपनी प्रबंधन तथा सरकारी तंत्र की अव्यवस्था से मजदूरों को खून के आंसू रोने पड़े। तमाम झंझावातों को सहने के बाद जब वह अपने घर पहुंचे तो फिर दुबारा बाहर न जाने की कसम खाई। उनका कहना है कि कुछ भी हो जाए अब बाहर नहीं जाना। यहीं रहकर मेहनत मजदूरी कर परिवार का भरण पोषण करेंगे।मधुबन तहसील क्षेत्र के सुआह गांव निवासी राजेंद्र बांके लाल शाह ने बताया कि वह मुंबई में किसी दुकान पर कार्य करता था। लाकडाउन के बाद काम बंद हो गया। वेतन तक नहीं मिला। जो पैसा बचा था उससे काम चलता रहा। फिर सब बंद हो गया। इसके बाद पैदल ही घर जाने को निकल पड़ा। कहा अब यहीं रहकर रोजी रोजगार करना है। परदहां ब्लाक क्षेत्र के रैकवारडीह गांव निवासी धर्मेंद्र मौर्य ने बताया कि वह अंबाला हरियाणा में एक कंपनी में काम करता था। लाकडाउन लागू होने के बाद कंपनी बंद हो गई तो उसने घर का रास्ता पकड़ा। मीलों पैदल चला। रास्ते में भोजन तक नहीं मिला। बाद में सरकारी व्यवस्था मिली तो ट्रेन व रोडवेज बस से घर पहुंचा हूं। कहा अब खेती किसानी से जीवन यापन करेंगे। घोसी के सरायसांदी निवासी मोहित चौहान ने बताया कि अंबाला हरियाणा में ठेला लगाता था। लॉक डाउन के बाद काम बंद हो गया। जो पैसा था वह भी खत्म हो गया। कई दिनों सिर्फ पानी पीकर गुजरे। जद्दोजहद के बाद घर पहुंचा। अब खेती, पशुपालन सहित अन्य रोजगार करेगा। घोसी के ही पूनापार भटौली के राकेश दुबे ने बताया कि काली आम हरियाणा में रोलिंग मिल में काम करता था। लाकडाउन में मिल बंद हो गई। प्रबंधन ने एक नहीं सुनी। भूखों मरने की नौबत आई तो पैदल ही घर को निकल पड़ा। किसी तरह सरकारी व्यवस्था होने के बाद घर पहुंचा हूं। अब हम यहीं रोजगार कर जीवन यापन करेंगे।