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किसान खेतों में जला रहे पराली

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मऊ। जिले के विभिन्न इलाकों में किसान पराली धड़ल्ले से जला रहे हैं। पराली से उठता धुआं जहां एक ओर पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है तो आग मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। पराली जलाने से न सिर्फ मिट्टी के उर्वरा शक्ति को नुकशान पहुंचा रहा है बल्कि इसका असर पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक खेतों में पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होती है। इसमें मिट्टी कीे पोषकता बढ़ाने वाले कीट भी नष्ट हो जाते हैं। इसका विपरीत प्रभाव वायुमंडल पर भी पड़ता है। उर्वरकता कम होने से फसल का उत्पादन प्रभावित होता है। जिले के विभिन्न इलाकों में कंबाइन मशीन से गेहूं कटाई का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। इसके चलते खेतों में पराली बच जाता हैं। किसान इन्हे आग के हवाले कर रहे हैं। किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर से अभी तक कोई पहल नहीं की गई है। पराली से उठने वाले धुएं से आंखों में जलन, सांस की बीमारी के अलावा अन्य बीमारियों के साथ लोगों को दूषित वातावरण की सौगात मिल रही है। कृषि विशेषज्ञों की माने तो खेतों में पराली जलाने से जमीन से फसलों को फायदा पहुंचाने वाले मित्र किट भी मर जाते हैं। गेहूं के अवशेष जलाने से 100 प्रतिशत नाइट्रोजन, 25 प्रतिशत, 20 प्रतिशत पोटाश और करीब 60 प्रतिशत सल्फर का नुकसान उठाना पड़ता है। इन तत्वों के कम होने से भूमि में मौजूद जैव विविधता का संतुलन बिगड़ जाता है। मिट्टी में होने वाली रासायनिक क्रियाओं के कारण कार्बन-नाईट्रोजन एवं कार्बन-फास्फोरस का अनुपात भी बिगड़ जाता है, जिससे पौधों में पोषक तत्वों की कमी आ जाती है। पौधों को पोषक तत्व न मिलने से जल निकासी भी नहीं हो पाती है। कार्बनिक तत्वों की कमी से जमीन की ऊपरी सतह कठोर हो जाती है और पौधा ठीक से नही पनप पाता। किसान अवशेष जलाने की बजाय मिट्टी पलट हल से जुताई कर देना चाहिए।
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