आपराधिक घटनाओं की जांच में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर नतीजे जल्दी सामने लाए जा सकते हैं। पोस्टमार्टम करते हुए डाक्टर और मौके पर जांच अधिकारी अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं तो गुत्थियों को सुलझाने में मदद मिलेगी। इससे न्यायिक प्रक्रिया में भी कम समय लगेगा।
विधि विज्ञान प्रयोगशाला लखनऊ की एक्सपर्ट टीम ने जिले के चिकित्सकों, पुलिस के सभी जांच अधिकारियों को न्यायिक अधिकारियों के समक्ष पुलिस लाइन सभागार में ऐसी ही तकनीकों की जानकारी दी।
कहा कि वर्तमान में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर चिकित्सक मामूली तकनीकों एवं जानकारियों से घटनाओं की सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
प्रयोगशाला के डायरेक्टर डा. एसबी उपाध्याय एवं डिप्टी डायरेक्टर डा. गयासुद्दीन खान ने संयुक्त रूप से प्रोजेक्टर के माध्यम से बताया कि मेडिको लीगल एवं पोस्टमार्टम रिपोर्ट में छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर घटना के कारणों का पता कम समय में लगाया जा सकता है।
लेकिन अभी तक सभी मामलों में अनावश्यक बिसरा परंपरागत रूप से संरक्षित किया जाता रहा है। कहा कि आधुनिक तकनीकी सहायता से अधिकांश मामलों में महज 10 एमएल ब्लड की शैंपलिंग से ही डीएनए से लेकर सैकड़ों जानकारियां जुटाई जा सकती हैं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में छोटी-छोटी बातों में भी चिकित्सक घटना का कारण नहीं लिखते हैं, जबकि इससे न सिर्फ समय जाया होता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में भी बाधा पहुंचती हैं।
गंभीर मामलों में पोस्टमार्टम की फोटोग्राफी, विडियोग्राफी भी लैब में भेजा जाए, साथ ही पंचायतनामा, मृतक का कपड़ा आदि भी लैब को भेजे जाएं।
कहा कि जहर और हार्ट अटैक सहित शाक से हुई मौत के मामले में दिल को खोलकर बहुत सारी बातें स्पष्ट की जा सकती हैं,
लेकिन अधिकांश चिकित्सक मृत्यु के कारणों को स्पष्ट नहीं लिखते हैं। इसी प्रकार पुलिस के विवेचना अधिकारियों को भी जानकारी दी कि वह घटना स्थल से साक्ष्य,
मृतक के कपड़े सहित जख्म एवं बदलते बयान की जानकारी लिपिबद्ध करें, ताकि बाद में इसकी वैज्ञानिक जांच होने पर सही गलत का पता लगाया जा सके। पुलिस पोलीग्राफी एवं नार्को टेस्ट की भी मदद ले सकती है। इसके बारे में भी तकनीकी जानकारी दी गई।