मऊ। परिवहन विभाग का मिशन सेफ फ्यूचर 3.0 अभियान चलाकर अनफिट स्कूली बसों पर कार्रवाई का दावा किया जा रहा है। दूसरी तरफ जिले की सड़कों पर खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाते डग्गामार वाहन मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। बिना परमिट, बिना फिटनेस और क्षमता से अधिक भरे ऑटो, वैन और ई-रिक्शा में ठूंस-ठूंस कर छात्र ढोए जा रहे हैं। सोमवार को हमारी टीम ने अभियान के बीच स्कूली वाहनों को लेकर पड़ताल की तो कहीं जगहों पर नियम को ताक पर रखकर कंडम जीप तक में बच्चों को ले जाते दिखे।
वैन, ऑटो में नगर के निजी नामचीन स्कूल के जाते दिखे छात्र
मऊ। नगर में डीसीएसके कॉलेज मोड़ पर सोमवार की दोपहर 12 बजे अवकाश होने पर एक वैन में ओवरलोड स्कूली छात्र दिखे। यह एक नामचीन स्कूल के बच्चे थे, वहीं एक दूसरे निजी स्कूल के बच्चे ऑटो रिक्शा में निजामुद्दीनपुरा मोहल्ले से निकलते दिखे। जबकि बहादुरगंज मोड़ पर एक लाल रंग की टवेरा गाड़ी से एक स्कूल के छात्र जाते दिखे। जबकि यह तीनों वाहन स्कूली छात्रों को ले जाने के लिए प्रतिबंधित है।
वाहन का टूटा था शीशा
रामपुर बेलौली। मधुबन तहसील में एक निजी स्कूल द्वारा मैजिक से स्कूली छात्र को ले जाते दिखा। चौंकाने वाली बात रही कि इस वाहन का शीशा टूटा था। वहीं एक निजी स्कूल में स्कूली छात्र को ले जाने के लिए डग्गामार जीप जिसमें स्कूली बच्चों को ले जाया जा रहा था।
सात सीटर बोलेरो में दस से अधिक स्कूली छात्र
दुबारी। मधुबन के दुबारी कस्बा में एक बोलेरो जिसमें यात्री क्षमता सात सीट की हैं, इसमें 10 से अधिक बच्चों को बैठे होना मिले। यह बोलेरो एक निजी स्कूल से जुड़ी है, जिसमें हर दिन बोलेरो से स्कूली छात्रों को ले जाया जा रहा है।
ओवरलोड ईको वाहन में स्कूल के बच्चे, सुरक्षा पर सवाल
अमिला। सोमवार को अमिला के दरगाह मोड़ पर एक कान्वेंट स्कूल के बच्चों को ले जा रही प्राइवेट ईको में सीटों से अधिक छात्र-छात्राएं सवार मिले। सड़क से गुजर रहे लोगों ने बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसी तरह से यहां ऑटो, मैजिक से कई स्कूली छात्र वाहन से अपने घरों को जाते दिखे।
अभियान में रजिस्टर्ड बसें ही रहीं निशाने पर
मऊ। परिवहन विभाग (आरटीओ) हर सत्र की शुरुआत में अनफिट स्कूली बसों की धरपकड़ का लेकर अभियान चलाने का दावा करता है, लेकिन इन डग्गामार वाहनों के खिलाफ कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई जाती। वर्तमान में मिशन सेफ फ्यूचर अभियान बीते 14 सितंबर से 19 सितंबर के बीच संचालित हुआ था। इसमें विभाग ने 179 वाहनों की चेकिंग करने और 13 का चालान के साथ छह वाहन सीज करने का दावा किया गया। जबकि ये वाहन लिंक रोड और रिहायशी इलाकों की गलियों से होकर बच्चों को सीधे स्कूल छोड़ आते हैं।
निजी स्कूलों के बसों से सस्ता, इसलिए भेजते हैं अभिभावक
मऊ। अभिभावक निजामुद्दीनपुरा की कविता पाठक, सहादतपुरा निवासी रमेश से बात की गई तो उन्होंने स्कूल बसों की मोटी फीस और उनके तय रूट को अपनी मजबूरी बताया। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल बसें घर के अंदर तक नहीं आतीं और उनकी फीस भी ज्यादा है। वहीं, ये डग्गामार वैन और ऑटो वाले कम पैसों में बच्चों को घर के दरवाजे से लेते हैं और वहीं छोड़ते हैं। कम खर्च के चक्कर में अभिभावक यह भूल जाते हैं कि वे अपने बच्चों को खतरे में डाल रहे हैं।
अधिकारियों की यह अनदेखी किसी बड़े हादसे के बाद ही जागती है। दांव पर मासूमों की जिंदगी। इस पूरे खेल में केवल प्रशासन ही दोषी नहीं है, बल्कि अभिभावकों की लापरवाही भी कम जिम्मेदार नहीं है। - अरविंद मूर्ति समाजसेवी
विभाग को अभिभावकों से बातचीत कर उनसे यह समझने की कोशिश करनी चाहिए वह नियम के विपरीत संचालित इन वाहनों से अपने बच्चों को क्यों भेज रहे हैं, इसके बाद वह अभिभावकों की समस्या को स्कूल प्रबंधकों के समक्ष भी रखें। यह भी एक दूसरा विकल्प है। - अमरेश सिंह जिलाध्यक्ष अभिभावक मंच
फैक्ट फाइल
जिले में 770 निजी स्कूल
लगभग 700 वाहन पंजीकृत
367 स्कूल बसें
333 छोटे वाहन स्टाफ लाने के लिए पंजीकृत