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ब्लाक प्रमुख पदों के लिए बिछने लगी बिसातें

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मऊ जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए तिथियों की घोषणा के बाद अब प्रमुख पदों के चुनाव की बारी है। प्रमुख पदों के दावेदार राजनीतिक दलों से प्रत्याशी बनाए जाने के लिए प्रयास में जुट गए हैं। सपा ने तो जनपद की आधी सीटों के लिए अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। लेकिन अन्य दल अभी वाच एंड वेट की नीति का अनुसरण कर रहे हैं। कई दावेदार सत्ताधारी दल भाजपा से प्रत्याशी बनाए जाने की जुगत में लगे हुए हैं।
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जिले में ब्लाक प्रमुख के नौ पद हैं। इनमें से पांच पर सपा की ओर से प्रत्याशियों की घोषणा कर दी गई है।ये प्रत्याशी अपने अपने क्षेत्रों में बीडीसी से संपर्क करने में भी जी जान से जुट गए हैं।वैसे तो कई दावेदारों ने पहले से ही पूरी तैयारी के साथ बीडीसी चुनाव में भाग लिया था। इनमें से कई दावेदारों ने तो पहले से ही स्वयं, अपनी पत्नी, भाई, भतीजों, मां, पिता जैसे नजदीकी रक्त संबंधियों को चुनाव लड़ाए थे। जिनमें से कई चुनाव जीते भी हैं।
प्रमुख पद पर कब्जे की हसरत लिए कैबिनेट मंत्री दारा सिंह चौहान के प्रतिनिधि भी खुद, अपनी पत्नी और भाई को बीडीसी का चुनाव लड़ाए थे लेकिन उनकी पत्नी चुनाव हार गई जबकि सभी नजदीकी चुनाव जीत गए हैं। इसी प्रकार फतेहपुर मंडाव, कोपागंज, घोसी, दोहरीघाट, मुहम्मदाबाद ब्लाकों में भी प्रमुखी का चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले कई दावेदार क्षेत्र में अपनी चुनावी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं। फतेहपुर मंडाव ब्लाक में तो एक ऐसे दावेदार भी हैं जिनके पिता कांग्रेस पार्टी में एक पदाधिकारी रह चुके हैं। वर्तमान में कांग्रेस में उनका रसूख भी है। उनके युवा बेटे प्रमुखी की तैयारी में हैं। वे सत्ताधारी दल के झंडे लगे वाहनों में भ्रमण करते हुए क्षेत्र में पूरी तैयारी से लगे हुए हैं। उनके कांग्रेसी पिता भी पूरी ताकत से भाजपा प्रत्याशी के रूप में बेटे की जीत के लिए लगे हुए हैं। सत्ताधारी पार्टी से बेटे को प्रत्याशी बनवा लेने के बाबत वे अपने संबंधों की बदौलत पूरी तरह आश्वस्त भी बताए जाते हैं।
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मुहम्मदाबाद गोहना ब्लाक में भी लखनऊ में मारे गए पूर्व ज्येष्ठ प्रमुख अजीत सिंह की पत्नी पूर्व प्रमुख रानू सिंह और मां भी बीडीसी का चुनाव जीत गई हैं। भाजपा में शामिल होकर रानू सिंह भी प्रमुखी की दौड़ में हैं। वैसे भी भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार अधिकांश दावेदार सताधारी दल से प्रत्याशी बनने की होड़ में लगे हैं। हालांकि पार्टी के जिम्मेदार लोग अभी इस संबंध में कुछ भी बताने से परहेज कर रहे हैं। बसपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। कांग्रेस को कोई पूछने वाला ही नहीं है।
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