मऊ। कृषि विज्ञान केंद्र, पिलखी पर धान की सीधी बुवाई सीड ड्रिल मशीन से वैज्ञानिकों की देख रेख में बुधवार को कराई गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह रोपाई विधि धान की खेती के लिए उपयोगी है। केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डा. एलसी वर्मा ने बताया कि यह योजना कृषि अनुसंधान परिषद लखनऊ द्वारा वित्त पोषित है। इसमें 75 हजार रुपयों का अनुदान है। परियोजना की निगरानी के लिए कोरटेवा एग्री साइंसेज की तरफ से गौरव सिंह सुपरवाइजर, प्रोजेक्ट आफिसर शुभम तिवारी, एवं अभिषेक भारती टेक्निकल सेवा के लिए रखे गये हैं। केंद्र के बीज प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक डॉ. हिमांशु राय ने बताया कि डीएसआर तकनीकी किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है। इसमें सीड ड्रिल मशीन से खाद और बीज एक साथ बोने का प्रावधान है। मृदा वैज्ञानिक डॉ चंदन सिंह ने बताया कि मृदा की जांच में कार्बन की मात्रा मानक के अनुरूप नहीं है तब भी सीधी बुवाई में पानी की 35 फीसदी बचत होती है। पादप रोग वैज्ञानिक लाल पंकज सिंह ने बताया कि बुवाई के 24 घंटे के अंदर खरपतवार नासी पेंड्रा मैथिली का प्रयोग किया जाना आवश्यक है। बुवाई से पूर्व बीज को दो प्रतिशत नमक के घोल के साथ डुबोकर छान लेना चाहिए। शस्य वैज्ञानिक डॉ. अंगद प्रसाद ने बताया कि एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्लिन और 12 ग्राम बविष्टिन 10 लीटर पानी में घोल बनाकर पांच किलोग्राम बीज का शोधन करने से धान की फसल में लेंढ़ा रोग नहीं लगता है। उद्यान वैज्ञानिक डा. जेके कुशवाहा ने बताया कि इस विधि द्वारा श्रम, पानी, खाद एवं मजदूर की बचत होती। मत्स्य वैज्ञानिक डा. जीडी गुप्ता ने अधिक पानी वाले खेतों धान के साथ मछली पालन कर अतिरिक्त आय अर्जित करने की तकनीक बताई।