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महर्षि वाल्मीकि की साधना स्थली रहा है वनदेवी धाम

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पिपरीडीह। परदहां ब्लाक के कहिनौर गांव के समीप दक्षिण पश्चिमी दिशा में स्थित प्राचीन मंदिर वनदेवी धाम लोगों के आस्था का केंद्र बना हुआ है। नवरात्र में यहां श्रद्धालुओं का विशाल हुजूम उमड़ता है। पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से मत्था टेकने के लिए लोगों के आने का क्रम लगातार चलता रहता है। मान्यता है कि नवरात्र में यहां सच्चे मन से पूजा अर्चना करने पर सभी मनोकामना पूरी हो जाती है।
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जनश्रुतियों और भौगोलिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्थान महर्षि वाल्मीकि की साधना स्थली रहा है। कहा जाता है कि जगत जननी सीता ने भी अपने अखंड पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए यहीं पर लव- कुश को जन्म दिया था। इस प्रकार यह स्थान आदि पुरुष वाल्मीकि, मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा माता सीता से जुड़ा हुआ है। एक कथा के अनुसार कालांतर में नर्वर के रहने वाले सिंघनुआ के बाबा को स्वप्न में देखा कि देवी कह रही हैं कि मैं यहां अकेली हूं। यहां आकर मेरी पूजा करो। अपने स्वप्न के आधार पर बाबा यहां आए तथा देवी की खोज करने लगे, जहां आज वनदेवी का मंदिर है वहीं उन्हें प्रकाश दिखाई पड़ा। बाबा ने फावड़े से ही भूामि को खोदना शुरू कर दिया। खोदने पर वहां वनदेवी की मूर्ति दिखाई पड़ी। बाबा मूर्ति को अपने घर ले जाना चाहते थे, लेकिन उस मूर्ति को हटा तक नहीं सके और वहीं पर उन्होंने प्राण त्याग दिया था। उनकी मौत के बाद मां वनदेवी अपने सिंहासन के साथ प्रकट हुईं। श्रद्धालु नारियल आदि चढ़ाकर ही मां की पूजा अर्चना करते हैं। इस धाम पर प्रतिवर्ष सैकड़ों युवक और युवतियां दांपत्य बंधन में बंधकर साथ जीने मरने का संकल्प लेते हैं।
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