मिट्टी के अखाड़े की कुश्ती को भारतीय कुश्ती संघ से मान्यता मिलने पर जिले के पहलवानों में आस जगी है। पदाधिकारियों के अनुसार अखाड़ों पर गद्दे की सुविधा नहीं है। मिट्टी पर राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता होने से पहलवानों को काफी फायदा मिलेगा। अब विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में देश को अधिक पदक मिलने की संभावना बढ़ गई है।
एक जमाना था जब हर गांव में अखाड़ा हुआ करता था। लेकनि उपेक्षा के चलते नाम मात्र अखाड़ा ही सक्रिय हैं। इन अखाड़ों से निकलकर तमाम पहलवान खेल कोटे से सरकारी विभागों में कार्यरत हैं। जिले के पहलवानों तथा जिला क्रीड़ा अधिकारी डॉ. अतुल सिन्हा की मानें तो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कुश्ती प्रतियोगिता में अब मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास करने वाले पहलवानों को दम खम दिखाने का बेहतर मौका मिलेगा। विश्व कुश्ती संघ से सहमति मिलने के बाद भारतीय कुश्ती संघ पहली बार मिट्टी के अखाड़े पर नेशनल लेवल की प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा है। जिले में मौजूदा समय में सरवां, भलयां, मुहम्मदाबादगोहना, उस्मानपुर आदि अखाड़े अभी भी सक्रिय हैं। इन अखाड़ों से निकल कर लगभग एक दर्जन से अधिक पहलवानों ने कुश्ती कोटे से नौकरी में हैं। सेना से लेकर रेलवे में भी उन्हें नौकरी मिली है।
कुश्ती कोटे से नौकरी पाने वालों में सरवां के मंगल सिंह, सुनील सिंह, विशाल साहनी, मैनेजर यादव, संतोष यादव सहित एक दर्जन पहलवान शमिल हैं। इस संबंध में रेलवे में कुश्ती कोटे से कार्यरत मंगल सिंह का कहना है कि मिट्टी के अखाड़े पर अभ्यास करने वाले पहलवान जब गद्दे पर कुश्ती लडने जाते हैं तो वे उतना अच्चा प्रदर्शन नहीं कर पाते।
इस बाबत जिला क्रीड़ा अधिकारी डॉ. अतुल सिन्हा का कहना है कि नई व्यवस्था से मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास करने वाले पहलवानों को राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में मौका मिलेगा।