नगर क्षेत्र के सरवां रोड स्थित ईट भट्टे पर चिलचिलाती धूप में मजदूर दिवस से बेखबर होकर अपनी बच्ची को लेकर काम करती कोईली।
बार बार मनरेगा से गांव के विकास और यहां के लोगों को रोजगार दिए जाने की बात की जाती है। लेकिन जिले में मनरेगा मजदूरों को पिछले वित्तीय वर्ष में औसतन 44 दिन का रोजगार मिला। प्रति मजदूर सौ दिन का रोजगार भी नहीं दिया जा सका।
जिले में दो लाख से ज्यादा मनरेगा मजदूर हैं। सरकार ने इन्हें कम से कम 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी दे रखी है। लेकिन पिछले वित्तीय वर्ष में इन्हें औसतन कुल 44 दिन का रोजगार मिला। पिछले वित्तीय वर्ष में मनरेगा के तहत कुल 36 लाख मजूदरों को मानव दिवस पर रोजगार दिया गया।
लेकिन 136 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मिलने वाली पूरे साल की कुल मजदूरी पांच हजार के लगभ है। इस रकम को यदि साल भर के 365 दिनों में बांटा जाय तो प्रतिदिन की आय 16.39 रुपये होती है। इस आय से क्या एक परिवार का गुजर हो सकता है, एक यक्ष प्रश्न है।
सरकार इसी मनरेगा योजना का ढिंढोरा पिटती है। पिछले वित्तीय वर्ष में मनरेगा मजदूरों को 136 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलती रही है जबकि नये वित्तीय वर्ष में सरकार ने 13 रुपये का इजाफा करके इसे 174 रुपये प्रति मजदूर प्रतिदिन कर दिया है। लेकिन यह मजदूरी भी काफी कम है। बाजार में मजदूरों की मजदूरी इन दिनों 250 से 300 रुपये है।