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दम तोड़ रहा साड़ी उद्योग, चुनाव में मुद्दा ही नहीं

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मऊ। मऊ नगर की पहचान मऊवाली साड़ियों से है। यह कारोबार पहले की अपेक्षा इन दिनों काफी बुरे दौर से गुजर रहा है। लेकिन इस नगरपालिका के चुनाव में इस कारोबार का मुद्दा ही नहीं किसी पार्टी या प्रत्याशी के जुबान पर है। दूसरी तरफ व्यापारी और बुनकर अपनी समस्या को कहें भी तो किससे कहें, इसलिए चुनाव की इस बयार में चुप्पी ही साधे हुए हैं।
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मऊ नगर के प्रमुख साड़ी कारोबार की कभी काफी साख हुआ करती थी। इसकी धमक देश के कोने-कोने से लेकर खाड़ी देशों तक थी। लेकिन आधुनिकता और सरकारों की उदासीनता के साथ ही स्थानीय स्तर पर इस कारोबार के प्रति कोई ध्यान न देने के चलते आज यह अपने बुरे दिन से गुजर रहा है। साड़ी से जुड़े व्यापारी एवं बुनकर दोनों ही परेशान हैं। व्यापारी जहां वर्तमान में इस कारोबार पर भी अलग से जीएसटी लागू होने को लेकर अभी ऊबर नहीं पा रहे हैं तो बुनकर इसी के चलते आई मंदी में मजदूरी कम का रोना रो रहे हैं। इससे दोनों के समक्ष संकट की स्थिति है। नगरपालिका के चुनाव नगर में पूरे शबाब पर है। हर कोई हवा हवाई विकास से लेकर विभिन्न कार्यों को कराने का वादा कर रहा है लेकिन साड़ी कारोबार की दुर्दशा पर न तो किसी पार्टी और न ही किसी प्रत्याशी का ही ध्यान है।

क्या कहते हैं व्यापारी
मऊ। निकाय चुनाव में व्यापारी और बुनकर अपने काम में उलझे हैं। वह कहीं जीएसटी को लेकर अभी कारोबार को पुुराने ढंग से पटरी पर आने की जद्दोजहद कर रहे हैं तो मजदूर मंदी की मार झेल रहे हैं। चुनाव में उनका मुद्दा कहीं न होने को लेकर उन्हें मलाल है लेकिन वह अपनी बात किसस कहें इसलिए चुप्पी साधे हुए हैं।
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साड़ी व्यापारी साजिद अनवर का कहना है कि यार्न पर पहले 18 प्रतिशत जीएसटी लगी थी लेकिन बाद में 12 प्रतिशत का ऐलान हुआ। घोषणा हुए काफी दिन होने के बाद उन्हें अभी इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। यहां के जनप्रतिनिधियों एवं प्रत्याशियों या पार्टियों को इन समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है। जितेंद्र राखोलिया साड़ी कारोबारी का कहना है कि चुनाव में नगर के प्रमुख उद्योग के प्रति किसी का ध्यान नहीं होता है। बुनकर मुहम्मद असलम काि कहना है कि पिछले तीन महीने से कारोबार में मंदी का दौर बड़ा है। इससे मजदूरी पहले की अपेक्षा और कम हो गई है। एकलाख अहमद का कहना है कि बुनकरों की दशा काफी दयनीय हो गई है। कुछ बुनकर मजदूरों के समक्ष तो रोटी के लाले पड़ गए हैं। ऐसे लोग इन दिनों अपना काम छोड़कर चुनाव प्रचार में ही लगना बेहतर समझ रहे हैं ।
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