मऊ। सरकार नदियों को स्वच्छ रखने तो लिए पूरे देश में अभियान चला रही है, लेकिन दूसरी तरफ मूर्तियों के विसर्जन को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। जिले की प्रमुख नदियां तमसा और घाघरा मूर्ति विसर्जन से प्रदूषित हो गई है। दुर्गापूजा के बाद अब दीवाली पर लक्ष्मी की प्रतिमा का विसर्जन होगा। प्रशासन की तरफ से नदियों में प्रतिमाओं के विसर्जन की वैकल्पिक व्यवस्था करना तो दूर कचरे को निकाले जाने की व्यवस्था तक नहीं की जा सकी है। जीवनदायिनी घाघरा तथा तमसा में विसर्जन से जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
तमसा तथा सरयू (घाघरा) का धार्मिक तथा पौराणिक महत्व है। लेकिन प्रतिमाओं के विसर्जन की वजह से इन्हें काफी नुकसान हो रहा है। हाईकोर्ट की तरफ से नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए प्रतिमा विसर्जन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने का फरमान जारी किया गया है। लेकिन विसर्जन पर अंकुश लगाना तो दूर विसर्जित प्रतिमाओं से निकले कचरे को निकालने के लिए व्यवस्था तक नहीं की जा सकी है। जिले में 383 स्थानों पर दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित की गई थी। छोटी-बड़ी मूर्तियों की संख्या करीब एक हजार से ज्यादा तमसा तथा घाघरा नदी में विसर्जित होती हैं। उनकी मिट्टी, केमिकल युक्त रंग नदी के जल में घुल जाने के बाद प्रदूषित हो जाता है। जिससे नदी के साथ जलीय जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है।
नदियों से प्रतिमा के अवशेष को निकालने के लिए संबंधित विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिया गया है। -डीपी पाल, अपर जिलाधिकारी
क्या कहते है विषेशज्ञ-
नदियों में एक ही जगह प्रतिमाएं विसर्जित होने से नदी का प्रवाह भी बाधित होता है। प्रतिमाओं में लगे केमिकल पानी में घुलने से नदी के पानी को साफ करने वाले जलीय जीव जंतुओं पर असर पड़ता है। नदी का पानी फसलों के सिंचाई के लिए भी प्रयोग होता है। इससे आम लोगों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ेगा। -डॉ. शिवशंकर सिंह, विभागध्यक्ष भूगोल, डीसीएसके पीजी कॉलेज