गरीबों के खाद्यान्न में हो रहे घोटालों को रोकने के लिए सरकार ने सस्ते गल्ले की दुकानों पर बायोमेट्रिक मशीनों के माध्यम से खाद्यान्न वितरण कराने की व्यवस्था किया है। इसके बावजूद राशन घोटाले होते रहे। दूसरों के आधार नंबर लगाकर राशन की उठान की जाती रही। जिलापूर्ति अधिकारी ने सघन जांच शुरु किया तो घपले की परत दरी परत उधड़ती रही। लेकिन इस जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। नगर क्षेत्र में वर्तमान में 165 सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानें संचालित हो रही हैं। विभागीय जांच में यह तथ्य सामने आया है कि इन दुकानों में 65 ऐसी हैं जिनका संचालन किराएदार कर रहे हैं। यानी सस्ते गल्ले की दुकान का लाइसेंस किसी और के नाम है और उन्हें चला कोई और रहा है। लाइसेंस धारक इन दुुकानों को 25 से 35 हजार रुपये प्रति माह के ठेके पर देख रखे हैं। ऐसी दुकानों को किराए पर चलाने वाले लाइसेंस धारक को प्रति माह नियत तिथि पर तय रकम अदा करते रहते हैं। लाइसेंस धारक को तय ंरकम देने वाले संचालक खाद्यान्न वितरण में धांधली करके अवैध कमाई करते हैं। जांच कर्ताओं को जांच के दौरान यह तथ्य सामने आए हैं। ये लाइसेंस धारक रसूख वाले हैं और अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम पर 20 से 25 साल पहले लाइसेंस ले रखे हैं। ऐसे लाइसेंस धारक कई वर्गों से हैं। तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों ने इनके प्रभाव में आकर इन्हें उपकृत करने के लिए रेवड़ी की तरह सस्ते गल्ले की दुकानों के लाइसेंस जारी किया था। उसी समय से ये दुकानें निर्बाध रूप से संचालित हो रही हैं। इन्हें कोई पूछने वाला नहीं था। अब हुई जांच में यह खुलासा हुआ है।
इस बाबत जिला पूर्ति अधिकारी नरेंद्र तिवारी का कहना है कि नगर क्षेत्र में ऐसी लगभग 65 दुकानें ऐसी चिह्नित की गई हैं , जिनके लाइसेंस किसी अन्य के नाम से है लेकिन उन्हें चला कोई अन्य अनधिकृत व्यक्ति चला रहा है।