बोझी बाजार। बड़रांव ब्लॉक क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में सार्वजनिक तालाबों पर अतिक्रमणकारियों का कब्जा है। इसके चलते कुंभकारों को मिट्टी उपलब्ध नहीं हो पा रही है। वहीं प्लास्टिक का प्रचलन बढ़ने से मिट्टी के बर्तनों की मांग कम हो गई है। इसके चलते कुंभकारी उद्योग विलुप्त होने के कगार पर है। लोगों ने आला अधिकारियों को अवगत भी कराया बावजूद आश्वासन के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हो सका है।
दो दशक पूर्व मिट्टी के बर्तनों के साथ-साथ इसके बनाने वालों की पूछ थी लेकिन आधुनिकता की मार कुंभकारी उद्योग को पीछे धकेल दिया है। आज स्थिति यह है कि सदियों की धरोहर कुंभकारी कला विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। इस संबंध में पं. विरेंद्र शुक्ल का कहना है कि मिट्टी के बर्तनों की महत्ता वेदों में भी है। बुजुर्गों की मानें तो कभी छोटी बाजार हो या मेला जगहों पर मिट्टी से बने बर्तनों और खिलौनों की भरमार रहती थी। गांव से लेकर शहरों तक हर कार्य प्रयोजन में मिट्टी के कुल्हड़ सहित अन्य बर्तन प्रयोग मेें लाए जाते थे। लेकिन अब मिट्टी के बर्तन पर आधुनिकता एवं मशीनरी युग का ग्रहण लग गया है। दीपावली में भी त्योहार को छोड़ दिया जाए तो इक्का दुक्का मिट्टी के बर्तन ही दिखायी देते हैं। कभी कुंभकारों के लिए मिट्टी का बर्तन आजीविका का साधन था लेकिन मशीनी युग के चकाचौंध ने इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को बेरोजगार बना दिया है। इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता पवन प्रजापति का कहना है कि महंगाई तेजी से बढ़ती ही जा रही है। सार्वजनिक तालाब पटते जा रहे हैं। प्रशासन तथा विभाग से मदद नहीं मिल पा रही है। प्लास्टिक का प्रचलन बढ़ने से मिट्टी के बर्तनों की मांग कम हो गई है। ऐसे मेें इस कारोबार से अब घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने कारीगरों को प्रशिक्षित करने के साथ ही परंपरागत उद्योगों को बढ़ावा दिए जाने की मांग की है। बुद्धिपुरा गांव के कुंभकार गोपाल प्रजापति, जीत प्रजापति, सुभाष प्रजापति का कहना है कि मोमबत्ती, बिजली बल्ब तथा चाइनीज झालरों की मांग के चलते दीयों की कम बिक्री हो रही है। मिट्टी के लिए सार्वजनिक तालाब से अतिक्रमण को हटवाया जाए।