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हजारों अति कुपोषित और भर्ती सिर्फ एक बच्चा

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मऊ। सरकार के कुपोषण मुक्त अभियान को उसी के जिम्मेदार विभाग पलीता लगा रहे हैं। जिले में कुपोषण के शिकार बच्चों की तादाद 65930 है। इसमें अतिकुपोषित बच्चों की संख्या 15806 है। गंभीर स्थिति के बच्चों के इलाज के लिए सरकार ने जिला अस्पताल में एनआरसी (पोषण पुनर्वास केंद्र) की स्थापना की है, लेकिन शनिवार को वहां महज एक बच्ची ही भर्ती मिली। ऐसे में साफ है कि स्वास्थ्य विभाग कुपोषण दूर करने में अपनी जिम्मेदारी को बखूबी नहीं निभा रहा। ऐसे में कुपोषण में कमी आने की जगह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है।
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सरकार की ओर से पिछले वर्ष अगस्त में आंगनबाड़ी केंद्रों पर दर्ज बच्चों का वजन करवाया था। इसमें आंकड़े चौंकाने वाले आए। जिले में 15806 बच्चे अति कुपोषण यानि लाल श्रेणी के पाए गए। जबकि 50124 बच्चे कुपोषित अर्थात हरी श्रेणी के मिले।
सरकार ने कुपोषण दूर करने के लिए जो व्यवस्था दी है उसमें बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भेजा जाए। जहां न सिर्फ इन बच्चों की बीमारी का इलाज होगा बल्कि उन्हें भरपूर डाइट दी जाएगी। इसके लिए जिला अस्पताल में एनआरसी स्थापित की गई है। इस केंद्र पर 10 बच्चों को एक साथ भर्ती करने के लिए बेड है। सरकार ने कई अन्य सहूलियतें भी दे रखी हैं।
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बाल विकास पुष्टाहार से जुड़े इस कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग को जोड़ा गया है। डाक्टरों की जिम्मेदारी है कि वह क्षेत्र भ्रमण करके या फिर आंगनबाड़ी केंद्रों में जाकर बच्चों को देखें। यदि कोई बच्चा गंभीर रूप से कुपोषित है तो उसे इस केंद्र में रेफर करें, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इस जिम्मेदारी को सही ढंग से निभाता नहीं दिख रहा।
केंद्र के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी माह से अब तक सिर्फ 93 बच्चों को यहां भर्ती किया गया। जबकि अति कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या हजारों में है। स्वास्थ्य विभाग को उनकी सुध ही नहीं है। वर्तमान में यहां सिर्फ आठ माह की एक बच्ची रंजना भर्ती है। बच्ची की मां मंजू ने बताया कि डायरिया होने पर 28 मई को इसे भर्ती किया गया है। इस संबंध में केंद्र पर बच्चों के उपचार का जिम्मा संभाल रहे बाल रोग चिकित्सक डा. एमपी सिंह का कहना है कि जब यहां बच्चे नहीं आएंगे तो वह इलाज किसका करेंगे। बच्चों को यहां भेजने की जिसकी जिम्मेदारी है उसे निभानी चाहिए। वहीं प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि विभागीय स्तर पर अति कुपोषित बच्चों में गंभीर प्रकृति के बच्चे चिह्नित किए जा रहे हैं। जिन्हें एनआरसी में भर्ती भी कराया जा रहा है। लेकिन अभिभावक जागरूकता के अभाव में इलाज पूरा होने से पहले ही केंद्र से चले जा रहे हैं।
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