दोहरीघाट क्षेत्र के गोठा स्थित रामलीला मैदान में चल रही संगीतमयी रामकथा के पांचवें दिन गाजीपुर से पधारे मानस मर्मज्ञ पं. विनोद मिश्र ने कहा कि प्रेम का अर्थ जानना है तो मीरा से पूछो। प्रेम की पराकाष्ठा है। मीरा का भगवान के प्रति प्रेम संसार में कोई ऐसा मित्र नही जो आंसुओ से चरण धो दे, वह एक ही था परमात्मा और मित्र था जिसका नाम सुदामा था। जब सुदामा के चरण धोते हुए साक्षात परमात्मा रो पड़े। पांव धो रहे कृष्ण रोते हुए कहते हैं कि जो मित्र के दुख को अपना मित्र समझे वही सच्चा मित्र है। कृष्ण सुदामा की मित्रता से हमें सीख लेनी चाहिए।
रामकथा को आगे बढाते हुए कहा कि दशरथ से जब कैकयी राम को चौदह वर्ष का वनवास मांगती है तो दशरथ रो पड़ते है और कहतें है कि महारानी मुझसे सब कुछ ले लो लेकिन मेरे राम को मुझसे दूर मत करो। कैकयी नहीं सुनती। इधर राजतिलक की तैयारी उधर राम को वन जाने की तैयारी के बीच दशरथ की पीड़ा का वर्णन करते बाबा तुलसी के शब्द भी बौने हो गए।
उधर कौशल्या जब राम वन जाने का समाचार सुनती हैं तो कहती हैं अब मैं क्या करूं। एक तरफ पति धर्म है तो दूसरी तरफ पुत्र प्रेम अगर अनुरोध कर रोकती हूं तो धर्म चला जाएगा। पुत्र प्रतिभागी होता है जो माता पिता को अपने आचरण से संतुष्ट कर देता है। उर्मिला के चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि उर्मिला मानस के नींव की ईट हैं। संस्कार आचरण आचार विचार सब कुछ रामकथा से आप को मिल जाएगा। पं राकेश कुमार पांडेय ने राजा परीक्षित की कथा सुनाकर सबको भक्ति गके भाव में बहने को मजबूर कर दिया।