दोहरीघाटक्षेत्र के गोठा के रामलीला मैदान में चल रही संगीतमय रामकथा के दूसरे दिन सोमवार को गाजीपुर से पधारे मानस मर्मज्ञ पं. विनोद मिश्र ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति इतनी प्रभावी हो गई है कि हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। हम रामचरितमानस का अनुसरण नहीं कर रहे हैं, जिससे हमारी संस्कृति कमजोर होती जा रही है। हमारी सनातन संस्कृति बेजोड़ है, जो पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित करती है।कहा कि राम के आदर्शों की बात तो हम करते हैं, लेकिन राम के आदर्शों को अपने जीवन में नहीं उतारते। अगर ऐसा हम करते हैं तो समझो मेरा जीवन सुधर जाएगा। मां सीता की खोज में विलाप कर रहे वहीं रास्ते से भगवान राम की परीक्षा लेने सती जा रही हैं। भगवान शंकर कहते हैं कि हे सती देखो मर्यादा पुरुषोत्तम राम लीला कर रहे हैं। पार्वती को शंकर जी मना करते हैं फिर भी वे नहीं मानती। सती सीता के वेष में आकर राम के सामने खड़ी हो जाती हैं। भगवान राम हाथ जोड़ते हुए कहा कि माता प्रणाम आप जंगल में कहां घूम रही हैं। यह सुनकर सती के पैरों तले जमीन खिसक जाती है तथा अपने किए पर काफी पश्चाताप करती हैं। भगवान शिव कहते हैं सती आप बार-बार झूठ बोल रही हैं तो अब इस शरीर से आप का भेंट असंभव है।
कथा को विश्राम देते हुए भजन सुनाया कि हरिनाम नहीँ तो जीना क्या, छोड़ उसे विष पीना क्या सुनाकर सबको भक्ति के सागर में डूबो दिया। कथा के अंत में आरती प्रसाद वितरण हुआ। रामकथा के मुख्य यजमान राधेश्याम गुप्त ने भगवान की आरती करने के बाद सबको प्रसाद वितरण किया।