मऊ। जिले के मरीजों को अस्पताल परिसर में आईसीयू (गहन चिकित्सा केंद्र) की सुविधा प्रदान करने के लिए अस्सी लाख रुपये की लागत से भवन तो तैयार किया गया। लेकिन अन्य संसाधन मुहैया न कराने के कारण इस सुविधा का लाभ जरूरतमंद मरीजों को नहीं मिल पा रहा। परिणामस्वरुप मरीज या तो वाराणसी सहित अन्य हायर सेंटर के लिए रेफर होते हैं, या फिर प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती होने के लिए विवश होते है।
जिले के शहरी क्षेत्र के साथ साथ मधुबन, घोसी, मुहम्मदाबाद गोहना, घोसी समेत आस-पास जिलों से गंभीर मरीजों का बेहतर इलाज हो सके। इस उदेश्य से राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत 2014 में जिला अस्पताल में अन्य कार्यो के साथ आईसीयू भवन बनाने का कार्य कार्यदायी संस्था यूपी प्रोजेक्ट कार्पोरेशन लिमिटेड ने किया। इस दौरान 80 लाख रुपये की लागत से आईसीयू भवन कक्ष का निर्माण किया गया। भवन बनने पर कार्यदायी संस्था ने उसे 4 जून 2015 को अस्पताल प्रशासन को हैंड ओवर भी कर दिया। लेकिन दो साल से अधिक समय बीतने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग की ओर से आईसीयू शुरू कराने के लिए स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स और स्टॉफ को पदस्थ नहीं करा सका। इसके अलावा आईसीयू कक्ष के लिए आश्वयक मशीन वेंटीलेंटर, इलेक्ट्रोनसीफेलोग्राफी ,पल्स ओक्सीतोमीटर, इंटरकर्नियल प्रेशर मॉनिटर,बेडसाइड मॉनिटर ,फीडिंग ट्यूब और कम्प्रेशन बूट्स जैसी महत्वपूर्ण मशीनों का भी अता पता नहीं है। आलम यह है कि लाखों की लागत से बना आईसीयू भवन डॉक्टर्स और मशीनों के अभाव में शोपीस बनकर अस्पताल की शोभा बढ़ा रहा है। जबकि अस्पताल में आने वाले गंभीर मरीजों को इसके अभाव में प्राथमिक उपचार के बाद वराणसी रेफर किया जा रहा है। इस संबंध में मुख्य चिकित्साधिकारी डा. सतीशचंद्र सिंह का कहना है कि विशेषज्ञ डाक्टर्स और सपोर्ट स्टॉफ को पदस्थ करने के लिए शासन को डिमांग पत्र भेजा जा चुका है।
आईसीयू के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक का होना अनिवार्य
मऊ। आईसीयू अस्पताल का विशेष विभाग होता है।जिसमें मरीजों को गहन उपचार दवा प्रदान करता है। जब अस्पताल में भर्ती मरीजों की हालात बिगड़ जाती है ओर उसके बचने की संभावन कम होती है तो उसे में रेफर कर दिया जाता है। जहां अलग अलग बीमारियों के रखें उपकरणों से उसकी गहनता से जांच की जाती है। आईसीयू में मरीजों की जांच के लिए दो कॉडियोलाजिस्ट, दो फिजिशयन और प्रशिक्षित सपोर्ट स्टॉफ की जरूरत होती है।