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ठंड शुरू होते ही विदेशी सैलानी पक्षियों पर आफत

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मधुबन(मऊ)। ठंड की शुरुआत होते ही विदेशी सैलानी पक्षियों पर आफत आनी शुरू हो गई है। गोलियों की तड़तड़ाहट और जाल में फंसे पक्षियों की चित्कार से पूरा ताल गूंजने लगा है। लेकिन उनकी चीखों की गूंज उनके रखवालों को नही सुनाई दे रही है। स्थानीय लोगों की माने तो रक्षक ही भक्षक बने हैं तो उनकी रक्षा कैसे हो बड़ा सवाल है। इन पक्षियों की कीमत छह सौ रुपये से लेकर दो हजार तक है। साइबेरियन देश से जीवन रक्षा के लिए क्षेत्र में आये इन पक्षियों के भक्षकों की वजह से जान पर बन आती है। इसका नतीजा यह है कि चिड़ियों की कलरव से गूंजता ताल अब सूना होने लगा है।
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मधुबन के पूर्व मधुबन बेल्थरा मार्ग के किनारे से लेकर बैरियाडीह, मुंड़ाडांड़, दुबारी के नीचे तक 49 किलोमीटर की लंबे चौड़े परिधि में फैले ताल रतोय में हर साल ठंड की शुरुआत में साइबेरियन लालसर, टिकवा, सुरखाब, निलसर, टिकवा जैसी अनमोल पक्षियां लंबी दूरी तय करके प्रवास पर आती हैं। जैसे ही साइबेरियन देश में गर्मी की आहट होने लगती है ये पक्षी अपने नौनिहाल बच्चों के साथ वापसी कर देते है। बताया जाता है कि इस प्रवास के दौरान ये पक्षी सुरक्षित जगह अंडे देते हैं और इसमें से निकले बच्चे ही इनकी स्वदेश लौटते समय अगुवाई करते हैं। लेकिन इनके लिए अब यह ताल सुरक्षित नहीं रहा।ताल के किनारे बसे ढिलाईफिरोजपुर, फतेहजपुर, ककराडीह, बैरियाडीह, दुबारी, लधुवाई, मर्यादपुर आदि दर्जनों गांवों के लोग बंदूकों से ताल में उतरी चिड़ियों पर फायरिंग करके झुंड के झुंड चिड़िया मारकर बाजार में उसकी विशेषता बताकर ऊंचे दामो पर बेच रहे हैं। इन चिड़ियों का ब्यापार करने वाले इन्हें छोटी चट्टी चौराहों से लेकर मऊ तक पहुंचाते हैं। वही मछुवारों द्वारा ताल में जाल डालकर इन्हें जिंदा पकड़ा जाता है जिनकी कीमत और बढ़ जाती है। लेकिन चिड़िया खाने के शौकीनों ने इन्हें संरक्षण देने वाले विभागों कोे भी ठेंगे पर रखा है। जिससे इन विदेशी पक्षियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है।
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