ब्रज में यमुना जीवित है लेकिन वेंटिलेटर पर सिसक रही है। खुले आम नाले और सीवर का पानी इसमें समा रहा है। कारखानों का रसायनिक कचरा, अवैध कट्टीघर की गंदगी नालियों के माध्यम से नदी में समा रही है। नदी में जलचरों का दम घुट रहा है।
गंगा और यमुना को जीवित प्राणी का दर्जा देने वाला नैनीताल उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला यमुना प्रेमियों के लिए सुखद है। वर्तमान में यहां भी यमुना मानों अपनी आखिरी सांसे गिन रही है। खुद अफसरों के निरीक्षण में इस बात का खुलासा हुआ है कि नाले, सीवर का पानी यमुना में सीधे गिर रहा है। इन नालों को एसटीपी-एसपीएस तक पहुंचाने का इंतजाम फेल है। इतना ही नहीं यमुना की खादर में बसी कालोनियों का सीवर और शहर के कई इलाकों का सीवर सीधे यमुना में समा रहा है।
खुद प्रदूषण विभाग की मॉनीटरिंग रिपोर्ट में भी इस बात का खुलासा हुआ है कि यमुना में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा न्यूनतम स्तर पर है। ऐसे में यमुना में विचरण कर रहे जलचरों का जीवन मुश्किल हो रहा है। ब्रज लाइफ लाइन द्वारा एकत्रित की गई रिपोर्ट के मुताबिक मथुरा में यमुना जल आचमन योग्य नहीं है। इसमें कई खतरनाक रसायन मौजूद हैं।
बीते माह आई प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट पर नजर डालें तो यमुना की अप स्ट्रीम पर घुलित ऑक्सीजन 4.7 पाई गई है जबकि यहां बीओडी 8.6 स्तर पर है। बोर्ड के अफसर बीओडी के इस स्तर पर जलचरों का जीवन मुश्किल होना बताते है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी की थी पहल
18 साल पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी यमुना को बचाने के लिए कई आदेश दिए थे, जिन पर अब तक सरकारी मशीनरी ने अमल नहीं किया है, जिससे यमुना की स्थिति और चिंताजनक हो गई है।