मान्यता है कि शिवजी ने अपनी जटाओं से झूला बनाकर मां पार्वती को झुलाया था। तभी से देवालयों में आराध्य देवों को झूला झुलाने की परंपरा चली आ रही है। हरियाली तीज के दिन बांकेबिहारी मंदिर में ठाकुरजी को विशेष रूप से सजे सोने-चांदी के झूले में विराजमान किया जाता है। वर्ष 1947 में इस झूले का निर्माण कराया गया था। सेवायतों के अनुसार, पूरे वर्ष में केवल इसी दिन ठाकुरजी दोनों समय–मंगल आरती और संध्या आरती में झूलते हैं।
प्रशासन ने भी किए हैं इंतजाम
अतिरिक्त पुलिस बल से लेकर पार्किंग, जूता घरों की संख्या बढ़ाई है। पुलिस प्रशासन ने भी अपनी ओर से पूरी तैयारी की है। किसी भी तरह की कोई परेशानी न खड़ी हो इसका विशेष ध्यान रखा गया है।
ठाकुरजी की थकान मिटाने के लिए सजाई जाती है सुख सेज
मान्यता है कि ठाकुरजी लगातार कई घंटे तक खड़े रहने से थक जाते हैं और शुष्क मौसम होने से ठाकुरजी का मनमोहनी सजीला शृंगार अव्यवस्थित हो जाता है। अपने आराध्य को सुख प्रदान करने के उद्देश्य से अंगसेवी सेवायत गोस्वामीजन गर्भगृह में सुख सेज सजाते हैं। विविध प्रकार के सुगंधित पुष्पों की लड़ी पिरोकर सेज के चहुंओर लगाई जाती है। गुलाबी मखमली सेज पर गुलाब की पंखुड़ियों को बिखेरा जाता है। रजत निर्मित सेज के समीप चांदी का नक्काशीदार शीशा व शृंगारिक प्रसाधन रखा जाता है।
साथ ही चांदी के थाल में पान की बीड़ी, मोतीचूर के लड्डू, केशरमिश्रित दूध आदि निवेदित किए जाते हैं। शयन आरती के उपरांत गोस्वामी जन ठाकुरजी के श्री विग्रह को पद गायन करते हुए सुख सेज पर ले जाते हैं। थकान उतारने के उद्देश्य से ठाकुरजी के श्री विग्रह की सुगंधित इत्र द्रव्यों से मालिश कर शयन पदों का सस्वर गायन कर विश्राम कराया जाता है। ठाकुरजी की सुखसेज के दर्शन भक्तों को सुलभ नहीं होते हैं।
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