आयकर विभाग ने आदिवासियों के नाम पर फर्में बनाकर की जा रही करोड़ों रुपये की कर चोरी का खुलासा किया है, जो वित्तीय वर्ष 2024-25 के कर असेसमेंट के दौरान सामने आया। इसमें 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की कर चोरी होने की आशंका जताई जा रही है। त्रिपुरा की एक युवती के नाम पर 12 करोड़ रुपये से अधिक की व्यावसायिक आय दर्ज हुई। इसी से यह खेल उजागर हुआ।
आयकर अधिनियम की धारा 10(26) की आड़ में यह खेल चल रहा था। विभाग की फेसलेस असेसमेंट व्यवस्था के तहत एक फाइल मथुरा कार्यालय पहुंची थी। दस्तावेज की जांच में त्रिपुरा निवासी 20 साल की युवती के नाम पर 12 करोड़ रुपये से अधिक की आय मिली। वह तीन कंपनियों की मालिक भी थी। इस मामले के सामने आने के बाद विभाग ने पड़ताल शुरू की। जांच में पता चला कि इस काम में एक पूरा सिंडीकेट शामिल है। कई और कंपनियों के शामिल होने से कर चोरी का यह आंकड़ा 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच सकता है। फर्मों की बैलेंस शीट की जांच में बड़े विरोधाभास सामने आए।
कर चोरी का तरीका
पूर्वोत्तर के जनजातीय युवाओं के पैन और बैंक विवरण का उपयोग किया जाता है। उनके नाम पर फर्में बनाई जाती हैं। इन फर्मों को बड़ी कंपनियों का वेंडर दिखाया जाता है। टावर रखरखाव, तकनीकी सेवाओं और मैनपावर सप्लाई के नाम पर बिलिंग की जाती है। भुगतान के जरिये बड़ी रकम इन खातों तक पहुंचाई जाती है। भुगतान खातों में पहुंचने के बाद धारा 10(26) की कर छूट का दावा किया जाता है।
जांच का दायरा बढ़ा
बड़े कारोबार के बावजूद इन फर्मों के कर्मचारियों, कार्यालय, परिवहन और अन्य परिचालन खर्च बेहद कम थे। वास्तविक सेवाओं, अनुबंधों, बिलों और भुगतान के रिकॉर्ड का मिलान किया गया। इसमें काफी विरोधाभास सामने आया। मथुरा कार्यालय से असेसमेंट की कार्रवाई के बाद फाइल आगे भेज दी गई है। विभाग अब धन के अंतिम प्रवाह और वास्तविक लाभार्थियों की पहचान में जुटा है। बैंक खातों, डिजिटल रिकॉर्ड, अनुबंधों और भुगतान की कड़ियों से रकम के स्रोत और उपयोग का पता लगाया जा रहा है।
आयकर अधिनियम की धारा 10(26) के तहत उत्तर-पूर्व राज्यों (जैसे असम, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड और मणिपुर) के अनुसूचित जनजाति के नागरिकों को उनकी स्थानीय आय पर सौ फीसदी आयकर से छूट मिलती है। मामला संदिग्ध पाए जाने पर इनकी जांच की जाती है।
- अजीत कुमार मिश्रा, आयकर अधिकारी