मथुरा। ब्रज के मंदिरों और निजी संग्रहों में 17वीं-18वीं सदी की ब्रजभाषा, संस्कृत और फारसी की दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज की जा रही है। दुर्लभ पांडुलिपियों को सहेज कर इनका डिजिटाइजेशन किया जाएगा। विकास विभाग के अधिकारियों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। यह शोधार्थियों के लिए खासा मददगार होगा और इनका संरक्षण भी बेहतर हो सकेगा।
ब्रजभाषा के जाने-माने कवि सूरदास, कृष्ण भक्ति के प्रसिद्ध कवि रसखान, बिहारी सतसई के रचयिता बिहारी लाल, रीतिकालीन कवि केशवदास, अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, प्रेम की पीर कवि घनानंद, गीतावली, विनय पत्रिका और कवितावली में ब्रज भाषा का प्रयोग करने वाले तुलसीदास, अष्टछाप के कवि कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास और मीरा बाई के पद भी ब्रजभाषा में हैं। साथ ही चौरासी वैष्णवन की वार्ता को ब्रज भाषा में लिखने में गोकुलनाथ का योगदान भी रहा है।
इनके अलावा, मध्यकाल में संत कवि कबीर, रैदास और गुरु नानक ने अपनी रचनाओं में ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। इनके द्वारा हस्त लिखित पांडुलिलियों को प्रशासन द्वारा खोजा जाएगा।
इन दुर्लभ पांडुलिपियों को खोजने में की अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। प्राचीन मठ, मंदिरों और पुस्तकालयों में इन्हें खोजा रहा है। मुख्य विकास अधिकारी डॉ. पूजा गुप्ता ने बताया कि ज्ञान भारतम मिशन के तहत पुरानी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या धार्मिक महत्व की हस्तलिखित सामग्रियों (भोजपत्र, ताड़पत्र, कागज, धातुपत्र आदि) को तलाशने का काम किया जा रहा है, ताकि इनका डिजिटलाइजेशन करके इन्हें सर्वसुलभ बनाया जा सके। इसके साथ ही इन साहित्यिक धरोहरों को सुरक्षित रखा जा सके।