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Mathura News: अंग्रजों से विद्रोह कर क्रांतिकारी किसान बन गया राजा

Sat, 12 Aug 2023 12:25 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
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मथुरा। जब भी स्वतंत्रता आंदोलन की बात आती है तो राजा देवी सिंह का नाम सम्मान से लिया जाता है। राया के गांव अचरू में जन्मे साधारण किसान देवी सिंह को 1857 की क्रांति ने राजा बना दिया। बात उन दिनों की है जब देश भर में आजादी के लिए पहली क्रांति हुई। 1857 की इस क्रांति ने अंग्रेजों को झकझौर कर रख दिया था। सभी जगह विद्रोह की ज्वाला धधक रही थी। मथुरा में भी यही हाल था। राया के गांव अचरू के रहने वाले साधारण किसान ने आसपास के लोगों को संगठित करते हुए अपनी सेना बना ली और अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने लगे। जिला मुख्यालय पर हमला बोल दिया। सरकारी इमारतों को आग लगा दी।
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देखते ही देखते अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इस विद्रोह का नेतृत्व करने लगे। देवी सिंह की चंद दिनों में बढ़ती लोकप्रियता को देख बल्लभगढ के राजा नाहर सिंह के आग्रह पर बादशाह बहादुरशाह जफर ने उन्हें राजा की उपाधि से विभूषित कर दिया। बहादुरशाह जफर के प्रतिनिधि बल्लीदाद खां ने देवी सिंह को सनद लिखकर दी कि राजा देवी सिंह को यमुना नदी के पूर्वी भाग का शासक नियुक्त किया जाता है। करीब एक साल तक उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद रखा, 15 जून 1858 को उन्हें 7 साथियों के साथ राया में सरेआम फांसी पर लटका दिया गया। राजा देवी सिंह को राया थाने के पीछे पीपल के पेड़ पर लटकाकर फांसी दी गई। वहां आज भी उनकी समाधि मौजूद है। उनके घर पर तोप से गोले बरसाए गए थे। तत्कालीन कलेक्टर मार्क थोर्नहिल ने अपनी आत्मकथा में राजा देवी सिंह का उल्लेख किया है।


राजा देवी सिंह की समाधि पर वर्ष में एक बार आयोजन किए जाते हैं, जिससे लोगों को उनके बलिदान की याद बनी रहे। प्रशासन को भी इसमें सहभागिता निभानी चाहिए।
इंजी. योगेंद्र पाल सिंह, वंशज राजा देवी सिंह



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गुमनामी में चौधरी देवकरण सिंह का बलिदान
देश की आजादी में अनिगिनत क्रांतिकारी बलिदान हुए हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता की खातिर अपने प्राणों की परवाह नहीं की, लेकिन इनका नाम इतिहास के पन्नों में कहीं नजर नहीं आता है। ऐसा ही एक नाम चौधरी देवकरण सिंह का है, जिन्हें विद्रोह के चलते अंग्रेजों ने सादाबाद में फांसी पर लटका दिया था। वर्तमान हाथरस जनपद की तहसील सादाबाद पहले मथुरा का हिस्सा हुआ करती थी। यहां के गांव कुरसंडा के जमींदार परिवार से चौधरी देवकरण सिंह ने 1857 में अंग्रेजी नेतृत्व में खिलाफ विद्रोह की कमान संभाल ली थी। लगभग 500 लोगों को एकत्रित कर अंग्रेजी सरकार की खिलाफत में जुट गए। सादाबाद थाना और तहसील को लूट लिया गया। सादाबाद परगने पर कब्जा कर क्षेत्र को स्वतंत्र घोषित करते हुए अपना ध्वज लहरा दिया था। यह ख़बर जैसे ही आगरा में अंग्रेज़ अफ़सरों तक पहुंची तो उन्होंने सैन्यबल के दम पर परगना वापस छीनने का प्रयास किया, लेकिन अंग्रेजी फ़ौज विफल रही, लेकिन क्रांतिवीरों का यह कब्जा ज्यादा समय तक नहीं रह सका। अंग्रेज़ों की बढ़ती फ़ौज ने चौधरी देवकरण सिंह व उनके साथी ज़ालिम सिंह को गिरफ़्तार कर लिया और एक नवंबर को खंदौली में साथियों के साथ फांसी दे दी गई।
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आजादी के बलिदान की अमर कहानियों को युवा पीढ़ी को बताने की जरूरत है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर प्रशासन को प्रयास करना चाहिए। खासकर 1857 की क्रांति के लिए यहां संग्रहालय बनना चाहिए।
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आदित्य चौधरी, वंशज चौधरी देवकरण सिंह
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