मथुरा। ब्रज और अयोध्या के बीच का जुड़ाव जगजाहिर है। इसी नजदीकी ने ब्रज को श्रीकृष्ण की जन्मभूमि को भी श्रीराम लला की तर्ज पर ईदगाह मस्जिद से मुक्त कराने को जागृत किया। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने जब राम जन्मभूमि पर फैसला सुनाया तो ब्रज में नारा दिया गया कि अयोध्या तो झांकी है, मथुरा अभी बाकी है।
इसके बाद श्रीकृष्ण जन्मभूमि से भी विवादित परिसर को हटाने के लिए कोर्ट में एक के बाद एक 18 वाद दायर किए गए। मामला पहली बार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को पहुंचा। जन्मभूमि-ईदगाह मामले में पक्षकार श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह ने दावा किया कि राम जन्मभूमि पर बाबर ने 1526 में कब्जा कर विवादित ढांचा खड़ा कराया था। इसके बाद कथित तौर पर 1670 में बाबर की पांचवी पीढ़ी के उत्तराधिकारी औरंगजेब ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर भव्य मंदिर को तोड़कर ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया। श्रीराम जन्मभूमि का विवाद इस प्रकार के धर्म स्थल पर अवैध कब्जे के रूप में कोर्ट पहुंचा था।
वहीं, 1832 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद का पहला केस स्वामित्व को लेकर कोर्ट पहुंचा था। इसके बाद वर्ष 1897, वर्ष 1920, वर्ष 1928, वर्ष 1944, वर्ष 1945, वर्ष 1955, वर्ष 1960 और वर्ष 1965, 1967 में अलग-अलग वाद दर्ज हुए। वर्ष 1968 में मथुरा में तत्कालीन डीएम आरके गोयल और एसपी गिरीश बिहारी ने इस प्रकरण को खत्म करने का रास्ता समझौते के तौर पर निकाला। समझौता हुआ, जो कि तब से अब तक विवादित है। 1947 में भारत की आजादी के बाद श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति को लेकर सामाजिक चेतना तेज हुई थी। 1984 के बाद ब्रज में श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए आंदोलन शुरू हो गया। तब तक श्रीकृष्ण जन्मभूमि का विवाद कुछ ही लोगों की जुबां पर था। 9 नवंबर 2019 को जब श्रीराम जन्मभूमि का फैसला आया तब लोगों में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की भी मुक्ति की चेतना तेजी से जागृत हुई।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि का प्रथम वाद स्वीकार्य
9 नवंबर 2019 को अयोध्या का फैसला आया और संजोग की बात है कि इसी वर्ष 21 दिसंबर को श्रीकृष्ण जन्मभूमि का प्रथम वाद स्वीकार्य हुआ। दरअसल, 25 सितंबर, 2020 को सिविल जज सीनियर डिवीजन, मथुरा की अदालत में लखनऊ निवासी रंजना अग्निहोत्री और अन्य द्वारा भगवान श्री कृष्ण विराजमान के अगले मित्र’ के रूप में याचिका दायर की गई। उन्होंने मस्जिद को हटाने और जमीन ट्रस्ट को वापस करने की मांग की थी। उन्होंने दावा किया कि शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण मुगल सम्राट औरंगजेब ने श्री कृष्ण जन्मभूमि के एक हिस्से को ध्वस्त करने के बाद किया था। सिविल कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद 21 दिसंबर 2020 को श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह ने वाद दाखिल किया, जिसे सुनवाई को स्वीकार कर लिया गया।