मथुरा-वृंदावन के बीच रेलयात्रा का एक मात्र साधन ‘रेलबस सेवा’ बीते छह महीने से बंद है। रोजाना वृंदावन-मथुरा आने-जाने वाले यात्री इससे बहुत प्रभावित हैं लेकिन रेल प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।
अधिकारी तकनीकी कारण कहकर बात से पल्ला झाड़ लेते हैं। नतीजा रोजमर्रा के यात्री और श्रद्धालुओं को आवागमन में परेशानी हो रही है।
देश के सबसे छोटे रेलवे ट्रैक में से एक मथुरा-वृंदावन रेलमार्ग पर चलने वाली रेलबस सेवा अपने आप में खास है। इससे यात्रियों को मथुरा-वृंदावन आने-जाने के लिए सुलभ और सस्ता साधन मिलता था।
कोहरे के मौसम में तो रेल बस सेवा सुरक्षित भी है। लेकिन, बीती 23 जुलाई से यह सेवा वेंटिलेटर पर आ गई है। छह माह पहले मथुरा-वृंदावन के बीच रास्ते में तकनीकी खराबी आने के बाद से रेलबस बंद हो गई थी।
अब दैनिक यात्री आवागमन के लिए टेंपो और बस से यात्रा करने को मजबूर हैं। ऐसे में जाम की परेशानी के साथ महंगा किराया भी खर्च करना पड़ता है। रेलवे के अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे।
अधिकारियों की उदासीनता का आलम यह है कि पिछली बार बीच रास्ते में रेलबस बंद होने पर इसे धक्का लगाकर स्टेशन तक पहुंचाया गया था। रेलबस सेवा दोबारा शुरूहोने के बारे में जब क्षेत्रीय प्रबंधक एमपी सिंह से जानकारी की गई तो उन्होंने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। तकनीकी अधिकारी जेएल शर्मा ने इसे अपने अधिकार से बाहर बताया है।
बार-बार ‘ब्रेक’
- 5 मई 2011 को तकनीकी खराबी के कारण बंद हुई रेलबस
- 28 मार्च 2014 को बंद हुई, कुछ समय बाद शुरू
- 3 मई 2015 को बंद होने के बाद 20 जुलाई को सेवा शुरू
- 23 जुलाई 2015 से अब तक है बंद
घाटे के कारण बंद हुई राधारानी पैसेंजर
वृंदावन। 1998-99 में रेलबस शुरू होने से पहले मथुरा-वृंदावन के बीच आठ कोच वाली राधारानी पैसेंजर ट्रेन चलती थी। स्टीम इंजन वाली यह रेलगाड़ी भी साधु-संतों, सैकड़ों दैनिक यात्री और छात्रों के लिए यात्रा का सुलभ साधन थी। इसके बंद होने के पीछे राजस्व में घाटा कारण बताया गया है।
जयपुर मंदिर निर्माण की निशानी यह रेलमार्ग
वृंदावन। वृंदावन-मथुरा के बीच रेलसेवा शुरू होना और जयपुर मंदिर का निर्माण एक ही घटनाएं हैं। बताया जाता है कि जयपुर घराने के राजा सवाई माधव सिंह द्वितीय ने वृंदावन में राधामाधव मंदिर (जयपुर मंदिर) का निर्माण शुरू कराया था।
1905-1908 के बीच हुए इस कार्य के लिए जयपुर और धौलपुर से लाल पत्थरों की ढुलाई के लिए मीटर गेज रेल लाइन बिछाई गई। इसके लिए राजा सवाई माधव सिंह ने तत्कालीन ब्रिटिश शासकों से विशेष अनुमति ली थी।
मंदिर निर्माण कार्य आरंभ होने के बाद मंदिर परिसर में ही रेलवे लाइन बिछाई और अस्थाई स्टेशन भी बनाया गया। रेल से पत्थरों की ढुलाई के कारण ही मंदिर का निर्माण 23 मई 1917 में पूरा हो पाया था।