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खुद ही कीजिए इंतजाम, कोई नहीं आएगा काम

Mon, 03 Apr 2017 11:20 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
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गर्मी ने किया परेशान
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इस बार गर्मियों से लड़ने के इंतजाम खुद ही कर लीजिए क्योंकि प्रशासनिक मशीनरी की सारी व्यवस्थाएं धड़ाम हैं। सरकारी अस्पतालों में ग्लूकोज नहीं है। इंडिया मार्का के 2,000 हैंडपंप खराब पड़े हैं। नगर निकायों में भी शुद्ध पानी की सप्लाई की कोई व्यवस्था नहीं हुई है। मथुरा को चौबीस घंटे सप्लाई के तो वादे हो रहे हैं लेकिन ट्रांसफार्मर का टोटा है। जबकि गरमी में ट्रांसफार्मर फुंकने की बड़ी समस्या रहती है। 
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दो हजार हैंडपंपों ने छोड़ा पानी का साथ
जनपद के दस विकास खंडों में 2,000 हैंडपंप खराब पड़े हैं। इनमें आधे रीबोर होने हैं तो शेष में दूसरी खराबियां हैं। इन हैंडपंपों को सही कराने के लिए कई दफा लिखा जा चुका है लेकिन अभी तक नतीजा सिफर ही है। जिला विकास अधिकारी उमेश चंद्र त्यागी का कहना है कि जिले भर में हैंडपंपों के लिए सर्वे कराया जा रहा है। सभी ब्लाक से रिपोर्ट मांगी जा रही है। रिपोर्ट आने के बाद सभी हैंडपंपों को सही कराया जाएगा। 

जिला अस्पताल में ग्लूकोज की कमी
गरमी का सीजन शुरू हो गया है। जिला अस्पताल में उल्टी, दस्त और गरमी के शिकार रोगियों की संख्या बढ़ रही है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन एक हजार रोगी आ रहे हैं। इनमें अधिकांश गरमी के शिकार हैं। इन रोगियों को ग्लूकोज चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। प्रतिदिन करीब 50 से 60 बोतल तक की खपत है लेकिन लगातार मांग करने के बाद भी मुख्यालय से ग्लूकोज नहीं आ रहा है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन स्थानीय स्तर पर खरीद कर बमुश्किल काम चला रहा है। 
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उधार के स्टाफ से चल रहा बर्न वार्ड
जिला अस्पताल में लाखों की कीमत से बना बर्न वार्ड भी जुगाड़ से चलाया जा रहा है। यहां प्लास्टिक सर्जन के दोनों पद लंबे समय से खाली पड़े है। इतना ही नहीं स्टाफ का भी संकट है। अस्पताल प्रशासन एनसीडी डिपार्टमेंट के स्टाफ से इस वार्ड को बमुश्किल चला पा रहा है। ऐसे में आग से झुलसे रोगियों को इस सीजन भी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा।

सूखी पड़ी हैं सभी नहरें
जनपद में तीन नहरें हैं। यमुना, अपर आगरा कैनाल और मांट ब्रांच गंग नगर। इन नहरों से पचास हजार से भी ज्यादा किसान अपनी फसलों की सिंचाई करते हैं। इस समय नहरों में पानी है ही नहीं। अब नहरों में फसलों की सिंचाई के लिए पानी भी नहीं है। परेशान किसान नलकूपों से फसलों की सिंचाई करने के लिए मजबूर हैं। इससे काश्तकारों को भारी नुकसान हो रहा है।
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