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Mathura News: पंचमार्क सिक्के से चमका मथुरा का पांचजन्य संग्रहालय

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मथुरा। भारत में सिक्कों का इतिहास प्राचीन और समृद्ध है। सबसे पहले 7वीं-6वीं शताब्दी ईसा पूर्व और पहली शताब्दी ईस्वी के बीच पंचमार्क सिक्कों का चलन शुरू हुआ। ये सिक्के अलग-अलग काल और जनपदों में मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। इन्हें महाजनपद काल के दौरान शासकों द्वारा जारी किया गया।
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मगध, चोला, कौशल, और पद्मावती नागा जैसे जनपदों में इन सिक्कों का प्रचलन अधिक था। ऐतिहासिक काल के इन सिक्कों की झलक पांचजन्य संग्रहालय की प्रदर्शनी में देखी गई। यहां पंचमार्क सिक्के, मौर्य कालीन सिक्के और शेरशाह सूरी के समय की मुद्राएं प्रदर्शित की गई हैं। ये सिक्के भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडों में मुद्रा प्रणाली के विकास की कहानी बयां करते हैं।


पंचमार्क सिक्कों की विशेषताएं
पंचमार्क सिक्के धातु के टुकड़ों से बनाए जाते थे, जिन पर ठप्पों के माध्यम से चिह्न अंकित किए जाते थे। इन सिक्कों पर कोई विशेष डिजाइन नहीं होती थी और इन्हें आहत सिक्के भी कहा जाता था। इस नाम का कारण यह है कि इनके निर्माण में धातु को पीटकर ठप्पे के जरिए आकृतियां बनाई जाती थी। इन सिक्कों में सूर्य, चंद्रमा, प्राचीन कथाओं और अन्य प्रतीकों के चित्र आड़े-तिरछे ढंग से अंकित होते थे। इसे कार्षापण भी कहा जाता है। पंचमार्क सिक्के एक लंबी अवधि तक, लगभग 800 से 1000 वर्षों तक प्रचलन में रहे।
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मौर्य काल और चित्र वाले सिक्के
मौर्य शासन के दौरान, विशेषकर चंद्रगुप्त मौर्य के समय, पंचमार्क सिक्कों का अधिक विकास हुआ। इन सिक्कों पर देवी-देवताओं, प्राचीन कथाओं और प्राकृतिक प्रतीकों के चित्र अंकित होने लगे। मौर्य काल में इन सिक्कों का प्रचलन बड़े पैमाने पर हुआ और ये राजवंशीय सिक्कों के रूप में विकसित हुए।


वस्तु विनिमय से सिक्कों तक का सफर
पंचमार्क सिक्कों के चलन से पहले वस्तु-विनिमय प्रणाली का उपयोग होता था। उस समय लेन-देन के लिए सोने, चांदी, और तांबे की वस्तुओं, जैसे बर्तनों का इस्तेमाल होता था। धीरे-धीरे राजाओं ने अपने राज्यों में धातु के सिक्कों पर चिन्ह अंकित करने की व्यवस्था शुरू की। यही प्रथा बाद में अधिक संगठित मुद्रा प्रणाली का आधार बनी।


शेरशाह सूरी ने किया रुपिया का आरंभ
1540 से 1545 के बीच, शेरशाह सूरी ने रुपिया नामक चांदी के सिक्कों को प्रचलन में लाया। ये सिक्के चांदी और तांबे से बनाए जाते थे और भारतीय मुद्रा प्रणाली के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आए।


भारतीय सभ्यता के बदलाव का प्रमाण हैं सिक्के
पुरातत्वविद डॉ. डी. राजा रेड्डी ने बताया है कि भारत में सिक्कों का इतिहास न केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम रहा है, बल्कि यह देश की राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास यात्रा का साक्षी भी है। पंचमार्क सिक्कों से लेकर आधुनिक रुपया तक का सफर भारतीय सभ्यता के विकास और बदलाव का प्रमाण है।


सिक्के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के प्रमुख श्रोतों में से एक हैं। तत्कालीन समाज की झलक प्रस्तुत करतीं हैं मुद्राएं।
कृष्ण मोहन दुबे, सहायक पुरातत्व अधिकारी, राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ
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मुद्राओं के अंकनों से प्राप्त होने वाली सूचनाओं का विश्लेषण तात्कालिक इतिहास के अध्ययन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
डॉ. विनय कुमार, मुद्राशास्त्र अधिकारी, राज्य संग्रहालय लखनऊ



पुरातत्वविदों ने शोध संस्थान का किया भ्रमण
मथुरा। भारतीय मुद्रा परिषद के तीन दिवसीय 106वें वार्षिक सम्मेलन में भारतीय मुद्रा के बारे में पुरातत्वविदों ने अंतिम दिन अपने-अपने शोध प्रस्तुत किए। उन्होंने संरक्षित सामग्रियों के साथ-साथ पांडुलिपियों एवं कलाकृतियों के संग्रह पर अपने विचार रखे। राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा पांग्जचन्य प्रेक्षागृह में तीन दिवसीय सम्मेलन बृहस्पतिवार को संपन्न हो गया। इसमें दो सौ पुरातत्वविद शामिल हुए। समापन समारोह में बलदेव विधायक पूरन प्रकाश पहुंचे। उन्होंने पुरातत्वविदों को सम्मानित कर सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के बाद प्रतिभागियों ने वृंदावन शोध संस्थान का शैक्षणिक भ्रमण किया, जहां उत्तर प्रदेश की पुरातत्व निदेशक रेनू द्विवेदी समेत अन्य पुरातत्वविदों ने ने शोध संस्थान में स्थित प्रयोगशाला, पांडुलिपियों एवं कलाकृतियों के संग्रह गृह एवं पुस्तकालय का अवलोकन किया। इस दौरान भारतीय मुद्रा परिषद के संयुक्त सचिव डॉ. अमित उपाध्याय, मुद्रा परिषद की अध्यक्ष प्रो. बिंदा समेत अन्य शामिल रहे।
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