ब्रज के विरक्त संत और पद्मश्री से सम्मानित रमेश बाबा के ब्रह्मलीन होने की खबर से बरसाना समेत पूरे ब्रज में शोक की लहर दौड़ गई। राधारानी की भक्ति, गोसेवा और ब्रज की प्राकृतिक एवं धार्मिक धरोहरों के संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले रमेश बाबा ने बरसाना के मान मंदिर को अपनी साधना स्थली बनाया। उनके प्रयासों से ब्रज में गोसेवा, कुंड संरक्षण, ब्रज यात्रा, पर्वतों को खनन से बचाने और हरिनाम संकीर्तन के क्षेत्र में बड़े काम हुए।
1938 में प्रयाग में हुआ जन्म
रमेश बाबा का जन्म 1938 में तीर्थराज प्रयाग में हुआ था। उनके पिता बलदेव प्रसाद शुक्ल प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य थे, जबकि माता का नाम हेमेश्वरी देवी था। मान मंदिर की जीवनी के अनुसार उनका जन्म पौष मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को दोपहर 12 बजे हुआ था। उनके पिता ने बचपन में ही उनके संत जीवन की भविष्यवाणी की थी। उन्होंने प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की और कम उम्र में ही आध्यात्मिक जीवन की ओर उनका झुकाव बढ़ गया। मान मंदिर की जीवनी के अनुसार उन्होंने 16 वर्ष की उम्र तक अपनी महाविद्यालयीन शिक्षा पूरी कर ली थी। संगीत में भी उनकी विशेष रुचि थी और उन्होंने पखावज, मृदंग, ढोलक, तबला सहित कई वाद्य यंत्र सीखे।
गृहस्थ जीवन से विरक्ति, ब्रज की ओर खिंचे चले आए
रमेश बाबा के मन में बचपन से ही ब्रज आने की तीव्र इच्छा थी। उन्होंने घर छोड़कर ब्रज आने के लिए दो बार प्रयास किया, लेकिन मां के स्नेह के कारण लौटना पड़ा। तीसरी बार उन्होंने गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर ब्रज की राह पकड़ ली। ब्रज पहुंचने के बाद उन्होंने प्रसिद्ध संत प्रियाशरण जी महाराज का शिष्यत्व स्वीकार किया। इसके बाद उनका जीवन राधारानी की भक्ति और ब्रज सेवा में पूरी तरह समर्पित हो गया।
बरसाना के मानगढ़ को बनाया साधना स्थली
रमेश बाबा ने बरसाना के ब्रह्माचल पर्वत स्थित मानगढ़ को अपनी साधना स्थली बनाया। उनके बरसाना पहुंचने के समय मान मंदिर का क्षेत्र घने जंगल और कठिन परिस्थितियों से घिरा था। मान मंदिर की आधिकारिक जीवनी के अनुसार उस समय यह स्थान बेहद दुर्गम था और मंदिर परिसर का इस्तेमाल डाकुओं द्वारा छिपने तथा लूटा हुआ सामान रखने के लिए किया जाता था। रमेश बाबा ने इसी स्थान को छोड़ने के बजाय अपनी साधना का केंद्र बनाया। धीरे-धीरे मान मंदिर बरसाना की प्रमुख आध्यात्मिक स्थली के रूप में विकसित हुआ।
गहवरवन और ब्रज की धरोहर बचाने का उठाया बीड़ा
रमेश बाबा की पहचान केवल संत के रूप में नहीं, बल्कि ब्रज संरक्षण के लिए संघर्ष करने वाले संत के रूप में भी बनी। उन्होंने गहवरवन समेत ब्रज के धार्मिक और प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण के लिए आवाज उठाई। ब्रज के अनेक प्राचीन कुंडों के संरक्षण और जीर्णोद्धार में भी उनके प्रयासों का उल्लेख मिलता है। इनमें रत्न कुंड, विह्वल कुंड, कृष्ण कुंड, बिछुआ कुंड, गया कुंड, लाल कुंड, गोपाल कुंड, रुद्र कुंड सहित कई कुंड शामिल हैं।
पहाड़ियों में अवैध खनन के खिलाफ बड़ा संघर्ष
ब्रज की धार्मिक पहाड़ियों में खनन के खिलाफ रमेश बाबा ने लंबे समय तक आंदोलन चलाया। वर्ष 2009 में कामां क्षेत्र में आमरण अनशन उनके संघर्ष का प्रमुख पड़ाव माना जाता है। मान मंदिर की सामग्री के अनुसार उनके साथ हजारों ब्रज यात्री और ब्रजवासी भी अनशन पर बैठे थे। इसके बाद ब्रज की पहाड़ियों को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय हुआ। इस संघर्ष के कारण उन्हें ब्रज संरक्षण और पर्यावरण रक्षा के लिए काम करने वाले संत के रूप में व्यापक पहचान मिली।
2007 में रखी माताजी गोशाला की नींव
रमेश बाबा की सबसे बड़ी सेवाओं में गोसेवा भी शामिल रही। मान मंदिर की आधिकारिक जानकारी के अनुसार 7 जुलाई 2007 को केवल दो गायों के साथ माताजी गोशाला की शुरुआत हुई थी। बाद में यह विशाल गोसेवा केंद्र बन गया। गोशाला की शुरुआत का उद्देश्य बेसहारा और वध से बचाई गई गायों की सेवा करना था। आज यह संस्था बड़े स्तर पर गोसेवा करती है। विभिन्न समयों के आधिकारिक आंकड़ों में यहां गायों की संख्या अलग-अलग बताई गई है, इसलिए अंतिम खबर में वर्तमान संख्या के लिए ताजा प्रशासनिक या गोशाला का आंकड़ा लेना उचित होगा।
राधारानी ब्रज यात्रा से गांव-गांव पहुंचा हरिनाम
रमेश बाबा की प्रेरणा से राधारानी ब्रज यात्रा यानी 84 कोस ब्रज यात्रा शुरू हुई। मान मंदिर के अनुसार यह यात्रा देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए नि:शुल्क आयोजित की जाती है। मान मंदिर की जानकारी के अनुसार उनके प्रयासों से हजारों गांवों में हरिनाम संकीर्तन की परंपरा पहुंची। ब्रज के धार्मिक स्थलों, कुंडों और प्राकृतिक धरोहरों को बचाने के साथ उन्होंने लोगों को ब्रज की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का काम किया।
यमुना मुक्ति आंदोलन में भी निभाई भूमिका
ब्रज की यमुना को प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए भी रमेश बाबा और मान मंदिर से जुड़े लोगों ने आंदोलन चलाया। यमुना की अविरलता और ब्रज में उसके वास्तविक स्वरूप को लौटाने की मांग को लेकर पदयात्राएं और जनजागरण अभियान चलाए गए।
पद्मश्री से हुए सम्मानित
ब्रज, पर्यावरण और गोसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2019 में रमेश बाबा को पद्मश्री सम्मान प्रदान किया। इसके बाद ब्रज में उनके सम्मान को लेकर विशेष उत्साह देखा गया। उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए संघर्ष करने वाले विरक्त संत के रूप में भी पहचान मिली।
बरसाना ही रहा कर्म और साधना की भूमि
रमेश बाबा ने अपना अधिकांश जीवन बरसाना के गहवरवन और मान मंदिर में बिताया। मान मंदिर की आधिकारिक जीवनी के अनुसार उन्होंने अपना जीवन ब्रज में ही बिताने और ब्रज की धूल में ही अंतिम समय बिताने की इच्छा व्यक्त की थी। उनके लिए ब्रज, ब्रजवासी और राधा-कृष्ण की भक्ति ही जीवन का केंद्र रहे।
रमेश बाबा के ब्रह्मलीन होने की खबर के बाद बरसाना में उनके अनुयायियों और श्रद्धालुओं में शोक है। संत समाज और ब्रजवासियों के बीच उनके निधन को ब्रज की संत परंपरा और ब्रज संरक्षण के आंदोलन के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है।