जिले में बढ़ती धान की खेती के बाद जलभराव वाले इलाकों में तेजी के साथ इजाफा हुआ है, यहीं मच्छरों की फौज पलती है। इस फौज से मलेरिया विभाग बमुश्किल जूझ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह मानव संसाधन की कमी है।
25 लाख की आबादी वाले जिले के लिए सरकार ने मलेरिया विभाग में 107 मलेरिया कर्मी के पद स्वीकृत किए हैं। लंबे समय से इनमें से अधिकांश पद खाली पड़े हैं। हालात ये हैं कि फिलहाल केवल सात कर्मी तैनात हैं। एक बार मलेरिया की रोकथाम के लिए 88 मल्टी परपज वर्कर की भर्ती भी हुई।
लेकिन मामला न्यायालय में लटक गया और मानव संसाधन के मामले में विभाग फिर अपनी पुरानी स्थिति में आ गया। ऐसे में जब कभी जिले के गांव से बुखार फैलने की सूचना आती है तो विभाग स्वास्थ्यकर्मियों की जोड़-तोड़कर मरीजों की स्लाइड बनाने का काम करता है।
...तो फिर आशाएं बनाती हैं स्लाइड
मथुरा। मथुरा में धान की खेती होने के चलते ग्रामीण अंचल में जलभराव के कई इलाके हैं। इन दूर-दराज के इलाके में जब कभी बुखार के रोगियों की सूचना आती है तो मुख्यालय से चिकित्सकाें की टीम जाती है। मलेरिया कर्मचारियों के न होने पर मरीजों की स्लाइड के लिए आशा कार्यकत्रियों को बुलाया जाता है।
मांट में है संवेदनशील गांव
मथुरा। बुखार को लेकर मांट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की सीमा में आने वाले गांवों को संवेदनशील चिह्नित किया गया है। इसमें नगला जगरुपा, इरौली जुन्नारदार, बेरा, राजा की गढ़ी, तुला की गढ़ी, जरारा, भदनवारा, सिंकदरपुर गांव और इनके नगला हैं। इसके अलावा धान की खेती वाले विकास खंड नौहझील, मांट, फरह, छाता, नंदगांव, राया, गोवर्धन के सभी गांवों को लेकर सतर्कता रहती है।
मलेरिया विभाग में मानव संसाधन की समस्या कार्य में बड़ी बाधा है। फिर भी बुखार के संबंध में जब भी कोई सूचना आती है, मुख्यालय से टीम भेजी जाती है। मरीजों की स्लाइड के लिए आशाओं की मदद ली जाती है। विभाग की ओर से हर साल करीब 80 से 85 हजार रोगियों की स्लाइड बनाकर जांच की जाती है।
-आरके सिंह, जिला मलेरिया अधिकारी मथुरा।