टीले पर बसी कान्हा की नगरी दरक रही है। दो दशक से ये दौर जारी है। यहां शायद ही ऐसा कोई दिन जाता हो जब किसी क्षेत्र के मकानों की दीवारों में दरार न आती हों। ऐसे में भूकंप का तेज झटका इन्हें कभी भी जमींदोज कर सकता है।
शहर में चौबिया पाड़ा, सतघड़ा, काला महल, गणेश टीला, बजरिया, कोयला वाली गली, मानिक चौक, पीरचंद्र गली, होली वाली गली, गोपालपुरा, माता गली, बिहारीपुरा, सतभुर्ज, गजा पाइसा, कुत्ता पाइसा ऐसे क्षेत्र हैं जहां मकानों की दीवारों में दरारें आना आम बात है। यहां के लोगों के लिए हर दिन दहशत के बीच ही गुजरता है।
कभी सूचना मिलती है कि सतघड़ा में जमीन बैठने से मकान फट रहे हैं तो कभी खबर लगती है कि काला महल में दीवार फट गई हैं।
टीले पर बसे शहर के इस हिस्से में प्राचीन इमारतों की भी भरमार है। मंदिर द्वारिकाधीश के सामने सेठ हवेली ऐसे ही प्राचीन स्थलों में है। इसी तरह गोवर्धननाथ हवेली है। दीर्घविष्णु मंदिर के निकट भी ऐसी प्राचीन हवेली है। शहर में ऐसे भवनों की भी भरमार है जो 100 से 200 वर्ष पुराने हैं। यह भवन भूकंप के किसी भी तेज झटके में शहर के लिए बड़ी समस्या बन सकते हैं।
इन प्राइवेट भवनों के साथ शहर में कई सरकारी भवन भी इसी हालत में हैं। कलक्ट्रेट स्थित पुराने डीएम कोर्ट की बिल्डिंग निष्प्रयोज्य घोषित हो चुकी है लेकिन इसका उपयोग आज भी किया जा रहा है। राजकीय इंटर कालेज के भवन का भी कुछ यही हाल है।