तकलीफ ऐसी थी कि दर्द अभी तक गया नहीं है। महीनों मेहनत के बाद खड़ी की गई फसल जब बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने तबाह कर दी तो किसान यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए थे। फसल खोने के गम में दर्जनों चल बसे लेकिन प्रशासन यह मानने को तैयार नहीं है। जनसूचना अधिकार (आरटीआई) के तहत दिए सवालों के जवाब में प्रशासन ने कहा है कि जिले में क्षतिग्रस्त फसल देखकर किसानों की मौत नहीं हुई।
वरिष्ठ आरटीआई कार्यकर्ता गिर्राज वशिष्ठ ने आरटीआई के तहत के जिला प्रशासन से कुल पांच बिंदुओं पर सूचनाएं मांगी थीं। इसमें दैवी आपदा ओलावृष्टि से फसल की क्षति देखकर मृत किसानों की संख्या, उनको मुआवजा वितरण का ब्यौरा और खरीफ की फसल के दौरान पड़े सूखा के प्रभावित किसानों को दिए गए मुआवजे संबंधी सवाल पूछे थे और उन पर जवाब मांगा था।
इस पर प्रभारी अधिकारी दैवी आपदा ने जो सूचनाएं उपलब्ध कराई हैं उसमें अवगत कराया गया है कि जिले में फसल की क्षति को देखकर किसानों की मृत्यु शून्य है। आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि हमने मृत 41 किसानों के नाम और पते की सूची भी उपलब्ध कराई थी लेकिन प्रशासन ने गलत और भ्रामक सूचनाएं उपलब्ध कराई हैं। आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि प्रशासन किसानों को गुमराह कर रहा है।
आपदा के दौरान मीडिया रिपोर्ट में मृतक किसानों के चित्र के साथ उनके बिलखते परिवारों के फोटो और समाचार प्रकाशित हुए थे। इन सभी तथ्यों को अनदेखा कर फसल क्षति देख किसानों की मृत्यु की सूचना शून्य बताना हास्यास्पद है।