एक पखवाडे़ तक शुभ और नवीन कार्यों पर लगा रहा ब्रेक अब खत्म हो रहा है। आज से शारदीय नवरात्रि के साथ ही शुभ कार्यों के द्वार खुलने जा रहे हैं। इसके लिए देवी मंदिरों के साथ ही घरों में भी तैयारियां की जा रही हैं।
नवरात्रि के पूजन की तैयारियों का असर शुक्रवार को बाजार में भी नजर आया। पिछले एक पखवाडे़ से खामोशी के दौर से गुजर रहे बाजार में रौनक लौट आई। हालांकि यह रौनक पूजन सामग्री और खाद्य पदार्थों से जुड़ी दुकानों पर ही ज्यादा दिखाई दी। लोगों ने शनिवार से शुरू हो रहे नवरात्रि के लिए खरीददारी की।
रंगेश्वर मंदिर वाली गली में अधिक भीड़ देखने को मिली। यहां हवन और पूजा सामग्री से लेकर देवी की प्रतिमाएं भी लोगों ने खरीदीं। कोसीकलां के मंदिरों में भी तैयारियां जोरों पर हैं। बाजारों में खरीदारी के लिए भीड़ उमड़ रही है।
16 साल बाद 10 दिवसीय नवरात्र
आज से शुरू हो रहे शारदीय नवरात्र की खास बात यह है कि यह आयोजन इस बार नौ दिवसीय न होकर 10 दिवसीय होगा। ज्योतिषाचार्य कामेश्वर चतुर्वेदी का कहना है कि एक अक्तूबर से प्रारंभ हो रहे नवरात्र प्रतिपदा तिथि दो दिन होने के कारण नौ दिन की बजाय 10 दिन रहेंगे। ऐसा योग 16 साल बाद बन रहा है। नवरात्र के दिनों में जो जातक पूरे नौ दिन व्रत नहीं रह सकते, उन्हें अष्टमी या नवमी के दिन उपवास रखकर हवन व कन्या पूजन कर मां भगवती को प्रसन्न करना चाहिए।
उपवास में चिकित्सकों की राय
- लंबे समय तक खाली पेट न रहें
- प्रत्येक दो-दो घंटे पर पानी और फल हल्की मात्रा में लेते रहें
- डायबिटीज के मरीजों को उपवास से पूरी तरह से बचना चाहिए
कलश स्थापना: एक अक्तूबर
सुबह 07:30 बजे से 09:00 बजे तक
सामग्री
मिट्टी का पात्र, जौ, शुद्ध जल और गंगाजल, मोली, इत्र, बड़ी सुपारी, दूब, सिक्के, अशोक या आम के पांच पत्ते, कलश ढकने को मिट्टी का दीया, ढक्कन में रखने को चावल, पानी वाला नारियल, नारियल पर लपेटने को लाल कपड़ा।
विधि
धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। कलश के चारों ओर गीली मिट्टी लगाकर उसमें जौ बोना चाहिए। कलश के कंठ पर मोली बांध कर शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें। कलश में बड़ी सुपारी, दूब, फूल, इत्र, कुछ सिक्के डालकर अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें। चावल से भरी कटोरी और उस पर नारियल रख दें। कलश पर लाल कपड़ा लपेट दें।
मूर्ति स्थापना
नवरात्र के प्रथम दिन एक लकड़ी की चौकी पर स्थापना करनी चाहिए। इसे गंगाजल से पवित्र करके
इसके ऊपर सुंदर लाल वस्त्र बिछाते हुए उसे कलश के दायीं और रखें। उसके बाद मां भगवती की
धातु की मूर्ति या नवदुर्गा का फ्रेम किया हुआ चित्र स्थापित करना चाहिए। सबसे पहले मां को दीप-धूप दिखाएं।
हर मुराद पूरी करती काली मां
वर्ष 1959 में महाशिवरात्रि पर कैंट वाली काली मां की स्थापना हुई। तत्कालीन विद्युत विभाग के एमडी कालीचरन भगत, मुकुंदराम चौबे नौघर वालों का मंदिर स्थापना में महत्वपूर्ण सहयोग रहा। छोटे रूप में शुरू हुए मंदिर ने बृहद रुप ले लिया है। मां के भक्तों की लंबी-लंबी कतार लगती हैं। महंत दिनेश चतुर्वेदी, महेश चतुर्वेदी ने बताया कि शनिवार को सुबह 11 बजे घट स्थापना होगी। 10 दिन के शारदीय नवरात्र पर नौ अक्तूबर को अष्टमी और 10 अक्तूबर को नवमी तिथि मनाई जाएगी। मंदिर में मां के विशेष सेवक डा. रमन टंडन हैं।