बलदेव-राया रोड पर बलदेव से तीन किमी दूर गांव बंदी में हर साल चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और यदुवंशियों की कुल देवी बंदी, आनंदी और मनोवाच्छा देवी की आराधना के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं। इस दौरान बच्चों के मुंडन संस्कार किए जाते हैं। कुश्ती दंगल आयोजन भी खास रहता है। इस बार यह आयोजन तीन अप्रैल को होगा। मेले को लेकर तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
गांव में मंदिर का निर्माण सन 1300 के आसपास देवी के भक्त घासीराम सेठ आगरा ने कराया था। बंदी देवी के चमत्कार का वर्णन भागवत के दसवें स्कंध के तीसरे और चौथे अध्याय में मिलता है। इसके अनुसार कंस की जेल में भगवान कृष्ण के जन्म के समय योगमाया के चमत्कार से जेल के पहरेदार सो गए थे। वासुदेव कृष्ण को नंद बाबा के यहां छोड़ आए और वहां से वे कन्या को ले आए।
योगमाया कंस के हाथ से छूट कर लुप्त हो गई। वासुदेव देवकी को बंधनों से मुक्त कराने वाली मैया और नंद के घर में आनंद बरसाने वाली आगे चल कर बंदी आनंदी देवी नाम से विख्यात हुईं। तीसरी मैया मनोवाच्छा देवी की मान्यता है कि यशोदा ने कंस और अन्य राक्षसों से कृष्ण-बलराम की रक्षा की कामना की थी। देवी ने यशोदा मैया की मनोकामना पूर्ण की। यही मनोवाच्छा कहलाईं।
आज भी मान्यता है कि मनोवाच्छा देवी भेंगापन, टेड़ापन, तुतलाना, हकलाना आदि दोषों को दूर करती हैं। इसके बदले में लोग देवी पर चांदी की जीभ और आंख अर्पित करते हैं। खास बच्चों के लिए यह पूजा की जाती है। वहीं बंदी के यदुवंशी जादौन समाज में आज भी नववधू सबसे पहले देवी के दर्शन करती है।
मंदिर के समीप ही स्थित आनंद कुंड मूर्तियों का प्राकट्य स्थल है। गर्ग संहिता के अनुसार मां बंदी ने राधाजी का शृंगार महारास में किया है। बंदी देवी ने माथे का तिलक आनंदी देवी ने कर्ण आभूषण भेंट किए। पुजारी रामस्वरूप और मेला आयोजन समिति के मानवेंद्र सिंह, मोहनश्याम प्रधान, भूपेंद्र सिंह जादौन आदि ने मेले में शामिल होने को कहा है।