बरसाना की सखियां रविवार को नंदगांव में होरी का न्योता देने गईं। उन्होंने बहनोई की तरह नंदगांव के हुरियारों का मान-सम्मान किया। मगर, जानकारी हैरानी होगी कि बिना शादी-संबंधों के पांच हजार साल से यह परंपरा निभाई जा रही है। बरसाना-नंदगांव के लोग आपस में अपने बेटे-बेटियों का विवाह नहीं करते हैं। ब्रज की इस अनोखी रीत को पांच हजार साल से सभी जाति-धर्मों के लोग निभा रहे हैं।
श्रीकृष्ण व ब्रज पर शोध कर रहे पीएचडी स्कॉलर महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि सूरदास की पंक्तियां...''ऊधौ मन न भए दस-बीस, एक हुतो सो गयौ स्याम संग, कौ अराधे ईस''
ब्रजवासियों खासकर गोपियों के कान्हा के प्रति प्रेम को बताने के लिए काफी हैं। कृष्ण को अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाली गोपियों और उद्धव की बातचीत को लगभग पांच हजार साल से अधिक समय हो गया। परंतु बरसाने की छोरियों के विवाह आज भी नंदगांव में नहीं होते। नंदगांव के विश्व प्रसिद्ध नंदबाबा मंदिर में राधारानी के दर्शन घर की बहू के रूप में होते हैं। नंदबाबा, माता यशोदा, बलभद्र और रेवती जी से अलग राधारानी एक कोने में बहू की परंपरा का निर्वहन करती हैं।
होली जगत विख्यात...पर रिश्ता मंजूर नहीं
ये बात और है कि बरसाना और नंदगांव की होली विश्व विख्यात है, लेकिन इन दो गांवों में आज भी भौतिक जगत के संबंधों को इजाजत नहीं दी जाती। यह अनूठा रिश्ता पिछले पांच हजार सालों से बरकरार है। होली खेलने के दौरान दोनों गांवों के हुरियारे-हुरियारिनों के बीच खूब हंसी-ठिठोली होली होती है, लेकिन शादी संबंध कर सांसारिक रिश्तों में बंधना इन्हें मंजूर नहीं।