मथुरा। शिक्षा का असली अर्थ जनपद में नए रूप में दिखाई दे रहा है। जो दिव्यांग बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पा रहे, उनके दरवाजे तक अब शिक्षक खुद पहुंच रहे हैं। इन बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शुरू की गई पहल न केवल शिक्षा को बढ़ा रही है, बल्कि उनके जीवन में आत्मविश्वास भी ला रही है।
जनपद में कुल 3345 बच्चे दिव्यांगता की श्रेणी में आते हैं। इनमें से अधिकांश बच्चे अपने नजदीकी विद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन 152 ऐसे बच्चे हैं जो शारीरिक या अन्य कारणों से स्कूल जाने में असमर्थ हैं। इन बच्चों के लिए 33 विशेष शिक्षक घर-घर जाकर जीवन जीने से जुड़ी बातें सिखा रहे हैं। जो बच्चे विद्यालय तक नहीं पहुंच पाते, उनके लिए सरकार की ओर से साल में 10 महीने तक 600 रुपये प्रतिमाह का एस्कॉर्ट भत्ता भी दिया जाता है, ताकि उनकी मदद की जा सके। इसके साथ ही शिक्षकों को निर्देशित किया गया है कि वे ऐसे बच्चों के घर जाकर उन्हें पढ़ाएं और उनकी जरूरतों को समझें।
ये शिक्षक केवल किताबों का ज्ञान ही नहीं दे रहे, बल्कि सांकेतिक भाषा के जरिए बच्चों को संवाद करना भी सिखा रहे हैं। किसी के लिए यह पहली बार है जब वह अपने मन की बात इशारों में कह पाता है, तो किसी के लिए यह सीख जीवन बदल देने वाली साबित हो रही है।
बीएसए रतन कीर्ति ने बताया कि समावेशी शिक्षा के तहत दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। बच्चों को चार श्रेणियों में (श्रवण बाधित, दृष्टिबाधित, मानसिक रूप से बाधित और ऑटिज्म से प्रभावित) वर्गीकृत कर उनके अनुसार शिक्षा दी जाती है। इसमें मानसिक दिव्यांग 2057, श्रवण बाधित 466, दृष्टिबाधित 214 और ऑटिज्म से प्रभावित 608 बच्चे पंजीकृत हैं।
घर पहुंचने वाले शिक्षक बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी जरूरी बातें भी सिखाते हैं। जैसे खुद की देखभाल, अपनी जरूरतों को बताया और दूसरों से जुड़ना। इतना ही नहीं, वे अभिभावकों को भी सांकेतिक भाषा का प्रशिक्षण दे रहे हैं, ताकि बच्चा अपने घर में भी बेहतर संवाद कर सके। यह पहल उन परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है, जिनके बच्चे अब तक शिक्षा से दूर थे।