लाली तेरे रंग में ऐसी है गई लाल, तन मन की सुध भूली, भूल गई संसार...। किशोर किशोरी के फाग मै भीजे रसिकन के उर मै कछू जे ही भाव है। हृदय के परम सुख की छाईं आंखन मै साफ नजर आय रही। राधे में लवलीन होय सब थिरक रहे। या रंग मै रंगवे कू ही तौ इतेक दूर ते आए हैं।
श्रीजी मंदिर के बाहर अंदर सब यई आनंद से अभिभूत नजर आए। अलग-अलग संस्कृति, वेशभूषा वारे इतै आयकै ऐसे हिल मिल गए कि बिनमै कोउ अंतर ही नाय रह्यौ। लाड़िली के दरबार मै हाथन मै हाथ लैकै नाच रहे।
श्रीजी मंदिर लाइव शाम 4:30 बजे
मंदिर के पट फिलहाल बंद हैं। श्यामा के दर्शन को सीढ़ियों के नीचे भक्तों की भीर जुटी है। राधे राधे की रट लगी है, दर्शन की लालसा बड़ी है। ऐसे में कोई भक्त टॉफी लुटाने लगता है। प्रांगण में खड़े लोगों में लूटने की होड़ लग जाती है। थोड़ी देर में पट खुलते हैं और भक्ति का सैलाब किशोरी के पास आ पहुंचता है।
विदेशी मेहमान भी बोले राधे राधे
लड्डू होली के मौके पर श्रीजी मंदिर में विदेशी मेहमान भी नजर आए। लाड़िली के दर्शन कर बाकी लोगों की तरह वे भी राधे राधे रटने लगे।
पुलिस ने मीडिया से की अभद्रता
मंदिर में व्यवस्था संभालने को लगाई गई पुलिस फोर्स मीडिया और कवरेज जैसे शब्दों से जान बूझकर अनजान बनी रही। मीडियाकर्मियों को अंदर जाने से रोका बल्कि उनके साथ अभद्रता भी की। तुमको हर जगह लिबर्टी चाहिए... पुलिसकर्मियों के ये शब्द थे। उन्होंने फोटो जर्नलिस्ट को भी कवरेज के लिए छत पर नहीं चढ़ने दिया।
रंग-रस में बोरी भई होगी सुबह
बरसाना फाग की मस्ती में डूब चुका हूं। चहुं ओर होरी के रसिया गूंज रहे हैं। ढोलक की थाप पर कोकिल कंठ गा रहे हैं। श्याम संग होरी खेलउंगी आज, मदमातौ फागुन आयौ... आज हर कसर निकारूंगी...। शुक्रवार की सुबह रंग-रस में बोरी हुई होगी। बरसाने के गैल गिरारे सब अबीर-गुलाल और रंगों में नहाए होंगे। रसिकों की टोली झूमती-गाती एक-दूजे पर गुलाल की मूंठें मारती चलेगी। सुबह 7 बजे से ही परिक्रमा प्रारंभ हो जाएगी। बाल गोपाल हाथों में पिचकारी लिए हुए छोरियों को तर-बतर करेंगे।
फूलों की छड़ियों से शुरू हुई थी रंगीली
रंगीली की परंपरा फूलों की छड़ियों से शुरू हुई थी। सोलहवीं शताब्दी में बरसाने की सखियों ने पुष्पों की छड़िया बनाकर नंदगांव के हुरियारों से होली खेली थी। करीब दो दशक बाद फूल लट्ठ में बदल गए और होली लठामार हो गई।
बरसाना के विद्वान मदन मोहन रसिया बताते हैं कि गौड़ीय वैष्णव नारायण भट्ट द्वारा श्रीजी के विग्रह के प्राकट्य के बाद संवत 1630 में रंगीली का उत्सव आरंभ हुआ। इस होली का आधार एक पद बना जो वाणियों में मिलता है और आज भी लठामार के दिन श्रीजी मंदिर में गाया जाता है। अति सरस बसै बरसाने जू, राजत रमणीक रमाने जू...जब दिन होरी कौ आयौ जू, न्यौता नंदगांव पठायौ जू, सुनकै मनमोहन ध्याये जू...। रसिकों ने अपने अनुभव के आधार पर वाणी में लिखा, वहीं लीलाएं मंचित होने लगीं।
इस पद में वर्णित द्वापर की लीला आज तक चली आ रही है। करीब 15-20 साल फूलों की छड़ियों से होली खेलनेे का चलन रहा फिर उसके बाद से शक्ति प्रदर्शन होने लगा। गोपियों ने कहा, हुरियारों, हमसे जीतकर दिखाओ। बल में हम भी तुमसे कम नहीं। द्वापर की लीला में गोपियों ने समय-समय पर अपना बल प्रदर्शित किया है। इसी तरह बरसाने की हुरियारिनों ने लट्ठ के माध्यम से अपनी शक्ति दिखाई है।
बरसाने की होली भाव और प्रेम से भरी है। हुरियारों को भाभी के लट्ठ भी बड़े प्यारे लगते हैं।
इसलिए कहते हैं, बरसाने में क्यों होती है प्रेम की बरसात, यह बात है बड़े राज की, चोरी से पूछिए।
इस बार भी नहीं होगी फूलों की वर्षा
शुक्रवार को लाड़िली जी मंदिर व रंगीली गली में होने वाली होली पर हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा नहीं होगी। सुरक्षा कारणों के चलते प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी है। पिछले साल भी पुष्प वर्षा नहीं हो पाई थी। इससे पहले हर साल बरसाना के वर्तमान चेयरमैन बलराज चौधरी द्वारा हेलीकॉप्टर से मंदिर व रंगीली गली में पुष्प वर्षा कराई जाती थी।
ध्वजा करेगी ठाकुर का नेतृत्व
ग्वाल बाल नंदगांव से ठाकुर जी की ध्वजा लेकर आते हैं। श्याम रूपी ध्वजा के नेतृत्व में होली होती है। ध्वजा लाने वाला व्यक्ति पैदल ही बरसाना आता है। लठामार खेलते समय ध्वजा साथ में रहती है। वसंत पंचमी पर नंदगांव के मंदिर में डाढ़ा रखा जाता है। उसी को ध्वजा कहते हैं।
बंद रहेंगे मंदिर के पट
नंदगांव के सभी ग्वाल बाल हुरियारे बनकर बरसाना आएंगे। होली के समय नंदलाल का मंदिर बंद रहेगा। ऐसा विश्वास है कि साक्षात श्याम ही राधा रानी से होली खेलने बरसाना आते हैं। अगले दिन जब बरसाना के हुरियारे राधा रानी की सखियों के रूप में होली खेलने नंदगांव जाते हैं तो श्रीजी के मंदिर के पट भी बंद रहते हैं।
पुलिस मेजबान भी और मेहमान भी
ब्रज के सबसे बड़े लोक उत्सव की मेजबान और मेहमान पुलिस ही है। यही वजह है कि इस मेले से पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के अलावा और कोई नहीं जुड़ पाता। वीआईपी चौक में न कोई संस्कृतिकर्मी नजर आता है न विदेशी मेहमान और न राजनीतिक प्रतिनिधि। यहां तक कि मीडिया को भी प्रवेश नहीं मिलता। प्रशासनिक महकमा रंगीली की महत्ता नहीं समझता इसलिए उसे व्यापक आयाम नहीं मिला।
रिसीवर कृष्णमुरारी का कहना है कि इस पूरे आयोजन में पुलिस का दखल रहता है। इसलिए हम अपनी तरफ से किसी को नहीं बुलाते क्योंकि उनके बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाती।