मथुरा। ब्रज के द्वारपाल के नाम से जाने जाने वाले भूतेश्वर महादेव के दर्शन का फल केदारनाथ के फल के बराबर होता है। यह लिंग स्वयंभू लिंग है जो कि केदारनाथ के उपलिंग के रूप में भी जाना जाता है।
भूतेश्वर मंदिर के सेवायत महंत भवानी गिरी ने बताया कि राक्षस मधु व केटप बहुत बलशाली थे। मधु के पुत्र लवणासुर ने भगवान भोलेनाथ की तपस्या की और अजेय रखने वाले त्रिशूल को वरदान में प्राप्त किया। लवणासुर के आतंक से त्रस्त साधु सन्यासी जब भगवान राम के पास गए तो उन्होंने लघु भ्राता शत्रुघन को लवणासुर का वध करने के लिए भेजा। शुत्रघन ने लवणासुर से दो दफा युद्ध किया और हार गए। तब उनके द्वारा भूतेश्वर की आराधना की गई।
इस आराधना से प्रसन्न होकर भूतेश्वर महाराज ने लवणासुर के मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा कि लवणासुर का वध ऐसे समय मेें ही हो सकता है जब उसके पास मेरे द्वारा दिया गया त्रिशूल न हो। तब शत्रुघन ने लवणासुर को स्नान करने के लिए जाते समय युद्ध के लिए ललकारा। इस भीषण युद्ध में त्रेता युग में लवाणसुर का वध हुआ।
द्वापर युग भगवान श्री कृष्ण ने जब कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद माता-पिता परिजन को चारों धाम ले जाना चाहा परंतु परिजन की संख्या अधिक होने के कारण उन्होंने मथुरा में सभी तीर्थों को बुला लिया, काशी विश्वनाथ नहीं आए। भगवान भूतेश्वर को ही काशी विश्वनाथ के रूप में पूजा गया। उन्होेंने बताया कि देवीपुराण के अनुसार कात्यायनी पिंड की रक्षा के लिए भूतेश्वर को ब्रज कोतवाल के रूप में जाना जाता है। संवाद