ढाई साल तक रामवृक्ष ने जवाहर बाग में मनमानी की। कभी मेन गेट को बंद करा देता तो कभी सरकारी आफिस पर कब्जा कर लेता। बाग को भी नुकसान पहुंचाया गया। शुरुआत में तो ज्यादा भीड़ भी नहीं थी।
आसानी से निकाला जा सकता था, फिर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। न्यायिक आयोग के इन सवालों में अफसर भी उलझकर रह गए। कुछ ने यह कहकर अपना पीछा छुड़ाया कि उस वक्त वह नहीं थे तो किसी ने कहा कि जब भी जवाहर बाग में अफसर जाते थे वहां भीड़ घेर लेती थी।
जवाहर बाग हिंसा की जांच के दूसरे दिन इस घटना से जुड़े कई अहम साक्ष्य आयोग की टीम के सामने रखे गए। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरा रिकार्ड न्यायिक आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत न्यायाधीश मिर्जा इम्तियाज मुर्तजा और आयोग के सचिव प्रमोद कुमार गोयल के समक्ष पेश किया।
49 लोगों ने शपथ पत्र देकर अपनी बात रखी। अधिकांश का सवाल यही था कि रामवृक्ष मार्च 2014 से जून, 2016 तक मनमानी करता रहा लेकिन किसी अधिकारी ने इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया। अगर पहले ही कदम उठा लिया गया होता तो इतनी भीड़ जमा नहीं होती।
जवाहर बाग वैसे भी सरकारी संपत्ति है। उद्यान विभाग की जमीन है। इस जमीन पर किसी को सत्याग्रह करने की अनुमति कैसे दी जा सकती है। आयोग को शपथ पत्र देने वालों ने कहा कि इस पूरे प्रकरण में पुलिस और प्रशासनिक अमले की भी लापरवाही रही है। अगर अफसरों ने सख्ती की होती तो आज यह हालात न बनते। आयोग ने भी यहीं सवाल अधिकारियों से किए।