मांग और आपूर्ति के बढ़ रहे अंतर के कारण आम आदमी की रोटी महंगाई की आग में तप रही है। इस आग को हवा देने वाली भी सरकार ही है। भारतीय खाद्य निगम की खुला बाजार बिक्री योजना में यूपी में विक्रय मूल्य पड़ोसी राज्यों से काफी अधिक है। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है।
शहर को रोजाना लगभग 5000 क्विंटल गेहूं की आवश्यकता रहती है लेकिन वर्तमान में आवक का स्तर गिरकर 1000 क्विंटल रह गया है। मांग और आपूर्ति की बढ़ती खाई का सीधा असर बाजार पर पड़ा है। इस खाई को पाटने के लिए भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की खुले बाजार में गेहूं की बिक्री योजना का लाभ भी उपभोक्ताओं को नहीं मिल पा रहा है।
फ्लोर मिल संचालक प्रतुल अग्रवाल ने बताया एफसीआई ने प्रदेश में गेहूं का विक्रय मूल्य अलग-अलग डिपो पर 1619 रुपये प्रति क्विंटल से 1745 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। इस पर साढ़े छह फीसदी वैट और मंडी शुल्क व ट्रांस्पोर्टेशन खर्चा अलग है। पड़ोसी राज्य में केवल 1550 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर एफसीआई का गेहूं उपलब्ध है जिस पर मात्र दो फीसदी कर देय है।
मिल संचालक संदीप बंसल ने बताया कि उत्तर प्रदेश में सरकारी गेहूं की कीमत अधिक होने के चलते यहां के कारोबारियों को मजबूरन हरियाणा और मध्य प्रदेश से गेहूं को लाना पड़ रहा है। आपूर्ति सुचारु न होने से इसका असर गेहूं के उत्पादों पर पड़ रहा है। जिसका खामियाजा आम उपभोक्ता को उठाना पड़ रहा है।
यूपी के डिपो से नहीं बिक रहा गेहूं
मथुरा। भारतीय खाद्य निगम की साइट पर जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनमें बीते माह दिसंबर के आखिरी सप्ताह में प्रदेश के कुल 15 डिपो पर एक लाख मीट्रिक टन गेहूं की नीलामी के लिए टेंडर मांगे गए थे। इस नीलामी में मिल संचालकों ने एक दाना भी गेहूं की खरीद नहीं की जबकि यूपी के कारोबारी हरियाणा और मध्य प्रदेश से गेहूं की खरीद कर रहे हैं।
किसान, उपभोक्ता, कारोबारी सब परेशान
प्रदेश में कुल उत्पादन का मात्र दस फीसदी गेहूं ही सरकार खरीदती है। फसल के समय गेहूं न बिकने पर किसान दर-दर भटकता है। इधर कम खरीद के चलते यूपी में हरियाणा और पंजाब का गेहूं ट्रांस्पोर्ट कर लाया जाता है। एफसीआई इस खर्च को जोड़कर विक्रय मूल्य घोषित करती है, जो पड़ोसी राज्यों से अधिक होता है। इस कुप्रबंधन का शिकार आखिरकार किसान, कारोबारी और उपभोक्ताओं को होना पड़ रहा है।