उच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) यमुना में प्रदूषण को लेकर बेहद गंभीर है लेकिन अफसर यमुना को लेकर हद दर्जे की लापरवाही कर रहे हैं। आलम ये है कि सबकी देखा-देखी यमुना के विचरण स्थल (खादर) में सैकड़ों कालोनियां बस गईं।
एक तरफ यमुना में बढ़ते प्रदूषण के खिलाफ उच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के सख्त आदेश हैं तो दूसरी ओर अफसरों की लापरवाही का जीता जागता उदाहरण भी मौजूद है। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अभिलेख भी इस बात की पुष्टि करते हैं। विप्रा के रिकॉर्ड में उसकी सीमा में 220 अवैध कालोनियां हैं।
इन कालोनियों में से पचास फीसदी कालोनी यमुना की खादर में विकसित हो गई हैं। ये अंाकड़े विप्रा के हैं लेकिन धरातल पर खादर में बसी कालोनियाें का आंकड़ा 200 से अधिक है। विडंबना ये है कि इन कालोनियों की तरफ से विप्रा ने ही आंखें नहीं मूंदी अन्य विभागों ने भी नजरें फेर लीं और अवैध कालोनियों में सभी प्रकार के विकास कार्य करा डाले।
अफसरों की इस लापरवाही का दंश यमुना झेल रही है। इन कालोनियों का सीवर, गंदा जल सीधे यमुना में समा रहा है। ये बात बीते पांच साल से यमुना के लिए आंदोलन कर रहे ब्रजवासियों को भी कचोटती है। लेकिन बावजूद इसके अफसर मौन हैं।
जिंदगी भर की पूंजी से खरीदा मकान
विप्रा द्वारा अवैध घोषित 220 कालोनियों के वाशिंदे भी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। रामनगर निवासी राधागोविंद ने बताया कि उन्होंने अपने जीवन भर की पूंजी से यहां मकान खरीदा है। जब उन्होंने मकान खरीदा तब उन्हें पता नहीं था कि ये अवैध है। अगर कार्रवाई हुई तो उनका परिवार सड़क पर आ जाएगा।
यमुना में जल आने पर करना पड़ता है पलायन
यमुना की खादर में बसी कालोनियों में रहने वाले लोग भी बेचैन रहते हैं। बारिश के मौसम में जब यमुना में जल का प्रवाह बढ़ता है तो इन लोगों को अपने घरों का सामान लेकर पलायन करना पड़ता है।