हुरंगा में पुरुषों के गोप समूह पर महिलाओं ने गोपिका स्वरूप में प्रेम से कोड़ों की मार की। पुरुषों के नंगे बदन पर कपड़े फाड़कर तड़ातड़ प्रहार किए गए, जिसे देखकर दर्शक आनंदित हो उठे। हुरंगा दोपहर 12 बजे शुरू हुआ। गोपिका स्वरूप महिलाएं पारंपरिक लहंगा-फरिया पहनकर पहुंचीं। मंच पर श्रीकृष्ण-बलराम और सखाओं ने अबीर-गुलाल उड़ाया।
हुरंगा में गोस्वामी श्री कल्याण देव जी के वंशज सेवायत पांडेय समाज के लोग ही भाग लेते हैं। समाज गायन में “होली आई रे श्याम, सुध लीजो” जैसे भक्ति गीतों की स्वर लहरियां गूंजती रहीं। महिलाएं “नंद के तोते गोरी जब खेलूं, मेरी पोहची में नग जड़वाय” जैसे पारंपरिक गीत गाती नजर आईं।
महिलाएं पुरुषों के बदन से कपड़े फाड़कर उन्हें टेसू के रंग में भिगोकर कोड़ा बनातीं और प्रेम से तड़ातड़ प्रहार करतीं रहीं, जबकि पुरुष मार खाते हुए नाचते-गाते दिखाई दिए। मंदिर और आसपास की छतों से गुलाल और फूलों की पंखुड़ियां उड़ती रहीं, जिससे पूरा वातावरण लाल गुलाल से भरे बादलों जैसा प्रतीत हो रहा था।
हुरंगा के दौरान हुरियारिनें झंडा छीनने का प्रयास करती हैं, जबकि पुरुष उसे बचाने की कोशिश करते हैं। अंततः महिलाएं झंडा छीनने में सफल रहीं। इस दौरान महिलाएं “हारे रे रसिया, जीत चली ब्रज नारि” गाती हुई दिखाई दीं। इसके साथ ही हुरंगा संपन्न हुआ और श्रद्धालु परिक्रमा कर अपने घरों को प्रस्थान कर गए।