अब क्यों जाए छिपें जननी ढिंग, रे द्वै बापन बारे,
तौ निकसि के होरी खेलो, कै मुख सौं कहौ हारे।
बहुत दिनन सों तुम मनमोहन, फागहि फाग पुकारे,
आज देखियों सैल फाग की, पिचकारिन के फुहारे।
‘जग होरी ब्रज होरा’ वृंदावन के ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में बुधवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ ब्रज की प्रसिद्ध होली खेली गई। गुलाल और रंग के उड़ते गुबार और फूलों से मंदिर प्रांगण होली के आनंद में सराबोर रहा। अपने आराध्य के प्रेम में खिंचे चले आए श्रद्धालुओं में ठाकुर बांकेबिहारी की झलक पाने की होड़ रही। ज्यों ही रंग की फुहार श्रद्धालुओं पर पड़ती वैसे ही मंदिर प्रांगण बांकेबिहारी महाराज के जयकारों से गुंजायमान हो उठता।
रंगभरनी एकादशी की पावन वेला में बुधवार शाम की बांके बिहारी महाराज ने भक्तों संग होली खेली। शाम 4:30 बजे मंदिर के पट खुलते ही मंदिर में सेवायत गोस्वामियों ने सर्व सबसे पहले रजत निर्मित सिंहासन पर विराजमान ठाकुरजी की श्वेत पोशाक पर स्वर्ण-रजत पिचकारी से केसर से बने रंग को डाल। इसी के साथ वृंदावन में परंपरागत होली का शुभारंभ हो गया।
ठाकुरजी के रंग लगते ही मंदिर प्रांगण में अबीर-गुलाल और फूलों बौछार होने लगी। श्रद्धालुओं ने होली का आनंद लिया। मंदिर सेवायतों ने टेसू केफूलों और केसर केरंगों को पिचकारियों में भरकर श्रद्धालुओं की ओर धार मारी। मौसम में ठंडक के बावजूद श्रद्धालु रंग से भीगकर खुद को निहाल कर रहे थे। इस अवसर पर मंदिर परिसर में इतनी भीड़ उमड़ी कि मंदिर के सुरक्षाकर्मी भी भीड़ के रेले को संभालने में मशक्कत करते दिखे।