जन-जन के आराध्य ठाकुर श्रीबांकेबिहारीजी आज हरियाली तीज पर्व पर श्रद्धालुओं को स्वर्ण-रजत हिंडोले में विराजकर दर्शन देंगे। ठाकुरजी का यह विश्व में एकमात्र स्वर्ण-रजत हिंडोला है। आयोजन के लिए ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
आज शाम 4 बजे से मंदिर में ठाकुरजी के सोने-चांदी से बने हिंडोले में दर्शन आरंभ हो जाएंगे। यह क्रम देर रात तक चलेगा। इसके साथ ही धर्मनगरी के अन्य मंदिरों, मठों और आश्रमों में हिंडोला महोत्सव की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। हरियाली तीज से वृंदावन के मंदिरों में हिंडोला उत्सव का विधिवत शुभारंभ हो जाता है। यह झूलनोत्सव के रूप में रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) तक मनाया जाएगा।
68 साल बाद वही संयोग
ठाकुर बांके बिहारी का स्वर्ण-रजत हिंडोला सौंदर्य, आकर्षण और भव्यता के लिएविश्व भर में विख्यात है। हिंडोले में तीन तिवारियां हैं। बीच में बांकेबिहारी झीने परदे की ओट में विराजते हैं, जिन पर गोस्वामीगण चंवर घुमाते रहते हैं। बगल की तिवारियों में रजत निर्मित चार निज सखियां बांके बिहारी की सेवा में मानो तत्पर रहती हैं। इसके अलावा हिंडोला का इतिहास भी रोचक है।
ठाकुरजी के भक्त राधेश्याम बेरीवाला के अनुसार 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बांकेबिहारीजी के हिंडोला का निर्माण कार्य उनके चाचा लाला हरगुलाल ने शुरू कराया था। बनारस के कारीगर छोटेलाल और ललन भाई के निर्देशन में 20 कारीगरों ने 5 वर्ष की मेहनत के बाद इस हिंडोले को तैयार किया। हिंडोला निर्माण में उस समय एक लाख तोले चांदी और 2200 तोले सोना और शीशम की लकड़ी का प्रयोग हुआ था। लकड़ी नेपाल के जंगल से खरीदी गई थी।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस पर बनकर पूरे हुए हिंडोले में ठाकुर बांकेबिहारी महाराज दो दिन बाद हरियाली तीज पर पहली बार विराजमान हुए। यह आजाद भारत की पहली हरियाली तीज थी। उन्होंने बताया कि इस फोल्डिंग हिंडोले की लागत उस समय लगभग 25 लाख रुपये आई थी।