जिस देश का भविष्य कृषि विकास की दर तय करती, आज उसी देश के किसान के घर में कोहराम है। प्रकृति की मार ने लहलहाती फसल को घायल किया तो उसे पालने वाले किसान का भी दम छूट गया। बेहाल विधवा को बच्चों के लिए दो जून की रोटी के साथ अब बिटिया के हाथ पीले करने की चिंता है। बेचारी ने संदूक में हाथ डाला तो चंद कागज हाथ में आए, जिन पर रुपयों की छाप की जगह कर्ज की कहानी लिखी मिली। दिलासा का दामन भी आंसू पोंछने के लिए काफी नहीं, अब दर्द को दवा की दरकार है।
रिफाइनरी निकट के गांव सेरसा में दो अप्रैल की शाम को इंद्र खेतों पर अपना प्रकोप दिखा रहे थे। गांव के विजय सिंह (45) उसी दौरान अपनी फसल देखने निकले। बारिश और ओलावृष्टि का कहर ऐसा था कि दिल झेल नहीं पाया और विजय सिंह को मौत ले गई।
सोमवार को अमर उजाला की टीम गांव पहुंची तो किसान के घर में दिलासा देने वालों की भीड़ थी। पत्नी ओमवती आंसुओं को रोकते-रोकते हार जाती। सिसकती आवाज ने बस इतना कहा कि अब बिटिया के हाथ कैसे पीले होंगे। हम पर तो बैंक और साहूकार का कर्ज है। घर में खाने के लिए कुछ नहीं और खेतों में फसल नष्ट हो गई। बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रहा बड़ा बेटा राजू मां को दिलासा दे रहा है कि मां अब हो गई पढ़ाई मैं घर को देखूंगा। छोटी बहन सुधा (18) की शादी और भाई महेश की जिम्मेदारी लेकर राजू परिवार पालने निकल पड़ा है।
तीन बीघा खेत और 11.94 लाख कर्ज
परिवारीजनों ने बताया कि उन पर तीन बैंकों के आठ लाख और साहूकार का ढाई लाख बकाया है। पिता ने अपने तीन बीघा खेत के अलावा 8 बीघा प्रति 18 हजार (1.44 लाख) के हिसाब से किराए पर लिया था। कर्ज की चिंता और फसल नष्ट होने के गम में पिता ने दुनिया छोड़ दी।