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Mathura News: ठाकुरजी की राग सेवा में वासंतिक पद और होली रसियाओं की गूंज

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वृंदावन (मथुरा)। मदनोत्सव के आगमन के साथ ही वृंदावन के मंदिरों, देवालयों और प्राचीन कुंज-निकुंजों में वासंतिक पदों और होली रसियाओं की मधुर गूंज सुनाई देने लगी है। हर दिन आराध्य के समक्ष सेवायतगण अपने आचार्यों द्वारा उद्घाटित प्राचीन वाणी ग्रंथों में फाग महोत्सव से संबंधित पदों का समाज गायन कर रहे हैं। इन पदों को राग सेवा के रूप में समर्पित किया जा रहा है।
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ठाकुर श्रीबांकेबिहारी मंदिर में बिना वाद्ययंत्रों के परंपरागत समाज गायन हो रहा है। वहीं, राधावल्लभ, प्रियावल्लभ, गोपीवल्लभ सहित अन्य मंदिरों में ढोलक, हारमोनियम, मंजीरा, तानपूरा, खड़ताल और चिमटा जैसे वाद्य यंत्रों के साथ समाज गायन की यह परंपरा जीवित है। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में भक्तजन दर्शन और श्रवण के लिए जुटते हैं।
समाज गायन का वैदिक इतिहास श्रीहरिदास पीठाधीश्वर आचार्य प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी महाराज ने बताया कि समाज गायन की उत्पत्ति सामवेद से मानी जाती है।
उन्होंने कहा कि देवर्षि नारदजी इस विधा के प्रथमाचार्य माने जाते हैं। वैदिक काल में सामवेद के मंत्रों का उच्चारण सप्तक के सात स्वरों के साथ किया जाता था। यह विधा बीच में लुप्तप्राय हो गई थी, जिसे महर्षि वेदव्यास ने ग्रंथों के माध्यम से पुनः प्रमाणित किया। ठाकुर श्रीबांकेबिहारी मंदिर में समाज गायन केवल सेवायत आचार्यजन करते हैं और यहां किसी वाद्ययंत्र का उपयोग नहीं होता।
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ब्रजमंडल में जीवित परंपरा
आचार्य ने बताया कि समाज गायन की यह परंपरा वैसे तो पूरे ब्रज की है। यहां यह परंपरा विशेष पर्वों और उत्सवों के दौरान अनिवार्य रूप से की जाती है। इन मंदिरों में स्वामी हरिदास महाराज और षटगोस्वामियों के समय से यह परंपरा चली आ रही है। वह बताते हैं कि समाज गायन में प्रमुख गायक को मुखिया और उसका अनुसरण करने वाले गायकों को सेला कहा जाता है। आसपास बैठे भक्तों के समूह को समाज कहा जाता है। भारतीय संगीत की ध्रुपद, धमार, होरी, ख्याल, टप्पा और ठुमरी शैलियों का इसमें समावेश है। इस परंपरा में हारमोनियम, ढोलक और अन्य वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है।
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